आँखों में लहू उतरा ही नहीं सिर्फ़ रगों में उबलता रहा
ज़िंदगी तिरे तपन से यह जिस्म मुसलसल जलता रहा
नज़र जिधर भी पहुंची सिर्फ़ दो ही नज़ारा मिलता रहा
कहीं तो पानी जमने लगा कहीं तो पत्थर पिघलता रहा
पहले साँस ने सीने को आग़ोश में लेकर सुकूँ पहनाया
फिर वो साँस औ" सीने का रिश्ता उम्र भर छलता रहा
जब तलवे भर ज़मीं भी न थी सिर्फ़ एडिओं चलता रहा
तब भी मगर हर चुनौती को एडिओं तले कुचलता रहा
गर्दिश को हासिल-ए-बुलंदी थी वक़्त भी ढ़लान पर था
तब रूह से एक जिस्म निकलकर ग़ुर्बत निगलता रहा
बात कम सुनने लगा फिर थोड़ी और कम कहने लगा
फिर हर बात पर ही जाने क्यूँ 'धरम' मन बहलता रहा
गर्दिश : संकट
ग़ुर्बत : ग़रीबी
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