Wednesday, 16 October 2024

ज़मीं पर कुछ आसमाँ बोता है

समंदर अपनी मर्ज़ी से  कब किनारा डुबोता है 
लहरें तब आती हैं जब कोई जज़्बात चुभोता है

उसे उरूज औ" ज़वाल से कोई फ़र्क़ ही कहाँ    
वो एक ही धागे में ज़मीं औ" आसमाँ पिरोता है
 
कहानी कैसी थी जिसमें हर किरदार ज़िंदा था
यूँ मोहब्बत में ऐसा  कब किसके साथ होता है

दरख़्तों की आँखें भी नम होकर झुक जाती हैं   
इस वीराने दश्त में इतना टूटकर कौन रोता है
 
कि दरमियाँ  दो ज़िस्मों के  ये रूह किसकी है 
बड़े इल्म से जो ज़मीं पर कुछ आसमाँ बोता है

मुफ़लिसी के इस आलम  को किससे बयाँ करे     
वो अपने काँधे पर "धरम" ग़ैरों का सर ढोता है      

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