Sunday, 6 October 2024

ख़ंज़र निगल लेगा

धुंध की आढ़ में अपने घर से निकल लेगा
वापस आएगा तो पता  अपना बदल लेगा

रिश्ते में नाराज़गी ऐसी कि ग़र बिछड़ें तो       
साथ जिस्म के ख़ुद ही दिल भी चल लेगा

सितारे महफ़िल में अब उदास रहने लगे   
कैसे यक़ीं करें कि  दिल ख़ुद बहल लेगा

तबी'अत को अब तो कुछ भी भाता नहीं  
बहार को ये यक़ीं है कि मन मचल लेगा

रूहानी बातें भी दिल तक पहुँच न पाई
ऐसा क्या करें  जिसपर वो 'अमल लेगा
 
मुझे इस बात पर बिल्कुल यकीं "धरम"  
वो क़त्ल करेगा औ" ख़ंज़र निगल लेगा  
 

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