Thursday, 17 October 2024

फ़लक ख़ुद ज़मीं से मिलते हैं

किरदार सारे आज़ाद तो हैं  मगर क़ैद रहते हैं 
सितम की बातें भी दूसरों की ज़बाँ से कहते हैं
 
कुछ याद नहीं कि ये दिल किसका मुंतज़िर है  
दिल में ढ़ेर सारे जज़्बात एक ही साथ बहते हैं
  
मंज़िल को ये गुमाँ  की वो बलंदी की इंतिहा है
ये पता नहीं दीवाने फ़लक के सर पर चलते हैं

बलंदी की दास्ताँ हक़ीक़त से मिलती ही नहीं            
इधर देख  यहाँ फ़लक ख़ुद ज़मीं से मिलते हैं

तहज़ीब ये कि दावत-ए-सुख़न सब को देते हैं    
तमाशा ऐसा कि  एक दूसरे के होंठ सिलते हैं

उस किरदार ने साँसें अपनी बेच दी  "धरम"   
अब उसकी आँखों में ग़ैरों के ख़्वाब पलते हैं  

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