किरदार सारे आज़ाद तो हैं मगर क़ैद रहते हैं
सितम की बातें भी दूसरों की ज़बाँ से कहते हैं
कुछ याद नहीं कि ये दिल किसका मुंतज़िर है
दिल में ढ़ेर सारे जज़्बात एक ही साथ बहते हैं
मंज़िल को ये गुमाँ की वो बलंदी की इंतिहा है
ये पता नहीं दीवाने फ़लक के सर पर चलते हैं
बलंदी की दास्ताँ हक़ीक़त से मिलती ही नहीं
इधर देख यहाँ फ़लक ख़ुद ज़मीं से मिलते हैं
तहज़ीब ये कि दावत-ए-सुख़न सब को देते हैं
तमाशा ऐसा कि एक दूसरे के होंठ सिलते हैं
उस किरदार ने साँसें अपनी बेच दी "धरम"
अब उसकी आँखों में ग़ैरों के ख़्वाब पलते हैं
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