Saturday, 19 October 2024

लहू उबाले उबलता नहीं

ये कैसा मोम है जो किसी भी आग में पिघलता नहीं
बड़ी हैरत की बात है कीचड़ उछाले उछलता नहीं 
 
अजीब मुलाक़ात थी  जो मरज़ मिला वो ऐसा मिला  
दर्द दिल में ऐसे समाया कि निकाले निकलता नहीं

इस बार का ये तूफ़ाँ पिछले सारे तूफ़ाँ से अलग था       
चराग़ इस तरह बुझा कि  फिर जलाये जलता नहीं

यादें बोझ हो चुकी थी  यादों को दफ़्न करना पड़ा        
उस क़ब्र से न जाने क्यूँ नज़र मिलाये मिलता नहीं

जुनूँ जब बलंदी पर पंहुचा हक़ीक़त ने राज़ खोला  
वो ठंढक आई ज़हन में  लहू उबाले उबलता नहीं

कि वो मसअला तो सिर्फ़ दो चराग़ों का था "धरम"
कैसी पसरी थी तारीकी शम' संभाले संभलता नहीं

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