Saturday, 19 September 2026

वो आसमाँ से भी ऊपर गया है

रूह जिस्म में मौजूद तो है फ़िर भी जिस्म मर गया है
साँसें नब्ज़ जज़्बात सब के सब न जाने बिखर गया है

कि वो जो मुझमें मेरे ज़िंदा होने का सबूत दे रहा था  
ज़रा देखो तो सही  वो हाथ हिलाकर किधर गया है

अभी तो वो अपने क़द तक भी खड़ा न हो पा रहा है
ज़माना कहता है कि वो आसमाँ से भी ऊपर गया है
  
कि आज फ़िर आफ़ताब वक़्त से पहले ढल गया है
पता तो करो क्या आज वो फिर बे-वक़्त घर गया है

दिल ख़ुद अपनी ही धड़कनों से डर कर बंद हो गया
जो दर्द बयाँ कर रहा था अब पूछने पर मुकर गया है

वो तिनका टूटकर गिरा तो भूल गया पैदाइश अपनी 
पर आज उससे मिलने चलकर ख़ुद वो शजर गया है
 
लब पर ताला था जज़्बात बयाँ करना एक गुनाह था 
जो ख़्वाब बयाँ कर न पाया वो चेहरे पर उभर गया है    

बज़्म में अब फ़िर वही रौनक लाएँ तो कहाँ से लाएँ
कि उसके साथ ही तो 'धरम' वो संग-ए-हुनर गया है

Friday, 4 September 2026

बिना बात के ही लहरा रही थी

एक जैसी बहुत मंज़िलें  आपस में टकरा रही थी  
औ" रास्तों के हेर-फेर में नज़र भी चकरा रही थी

सारे शागिर्द अपनी-अपनी राह पर निकल रहे थे
कि यह देखकर वहाँ सबकी आँखें पथरा रही थी 

मातम जैसा कद-काठी था  ग़म जैसी शक़्ल थी  
न जाने किसको याद करके वो मुस्कुरा रही थी

परछाई कभी पास आकर तो कभी साथ रहकर  
कभी दूर जाकर बिना बात के ही लहरा रही थी

शक्ल पहली नज़र में ही  पहचान में आ गया था   
न जाने क्यूँ ज़ेहन में बातें उसकी बिसरा रही थी

वो बीमारी कैसी थी  और वो हवा कैसी चली थी   
अपनी शक़्ल अपनी ही बातें सबको डरा रही थी

जज़्बातों के चादर में ढेर सारे सूराख़ बन गए थे
जब भी कभी मिली बस वही बातें दोहरा रही थी

"धरम" जब ज़िक्र समंदर के उतरने का चला तो  
वहाँ बैठे सिकंदर की आवाज़ भी थरथरा रही थी