एक जैसी बहुत मंज़िलें आपस में टकरा रही थी
औ" रास्तों के हेर-फेर में नज़र भी चकरा रही थी
सारे शागिर्द अपनी-अपनी राह पर निकल रहे थे
कि यह देखकर वहाँ सबकी आँखें पथरा रही थी
मातम जैसा कद-काठी था ग़म जैसी शक़्ल थी
न जाने किसको याद करके वो मुस्कुरा रही थी
परछाई कभी पास आकर तो कभी साथ रहकर
कभी दूर जाकर बिना बात के ही लहरा रही थी
शक्ल पहली नज़र में ही पहचान में आ गया था
न जाने क्यूँ ज़ेहन में बातें उसकी बिसरा रही थी
वो बीमारी कैसी थी और वो हवा कैसी चली थी
अपनी शक़्ल अपनी ही बातें सबको डरा रही थी
जज़्बातों के चादर में ढेर सारे सूराख़ बन गए थे
जब भी कभी मिली बस वही बातें दोहरा रही थी
"धरम" जब ज़िक्र समंदर के उतरने का चला तो
वहाँ बैठे सिकंदर की आवाज़ भी थरथरा रही थी
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