रूह जिस्म में मौजूद तो है फ़िर भी जिस्म मर गया है
साँसें नब्ज़ जज़्बात सब के सब न जाने बिखर गया है
कि वो जो मुझमें मेरे ज़िंदा होने का सबूत दे रहा था
ज़रा देखो तो सही वो हाथ हिलाकर किधर गया है
अभी तो वो अपने क़द तक भी खड़ा न हो पा रहा है
ज़माना कहता है कि वो आसमाँ से भी ऊपर गया है
कि आज फ़िर आफ़ताब वक़्त से पहले ढल गया है
पता तो करो क्या आज वो फिर बे-वक़्त घर गया है
दिल ख़ुद अपनी ही धड़कनों से डर कर बंद हो गया
जो दर्द बयाँ कर रहा था अब पूछने पर मुकर गया है
वो तिनका टूटकर गिरा तो भूल गया पैदाइश अपनी
पर आज उससे मिलने चलकर ख़ुद वो शजर गया है
लब पर ताला था जज़्बात बयाँ करना एक गुनाह था
जो ख़्वाब बयाँ कर न पाया वो चेहरे पर उभर गया है
बज़्म में अब फ़िर वही रौनक लाएँ तो कहाँ से लाएँ
कि उसके साथ ही तो 'धरम' वो संग-ए-हुनर गया है
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