बता किसके सीने में ज़ख्म इतना गहरा होता
ग़र वो समंदर न होता तो इतना न ठहरा होता
ऐ! दिल थोड़ी सी आग में इतना ज़ियादा धुआँ
तू भी सलीक़े से जलता ग़र तुझमें अहरा होता
दर्द ख़ुद बेचैन हो तपकर ज़मीं पर राख होता
ले देख की सीने में कोई ऐसा भी सहरा होता
ज़माने की बात थी एक दरियादिली याद आई
वो टूटकर कैसे बिखरा इसपर भी पहरा होता
ख़ुद अपनी बर्बादी की आहट भी न सुन सके
मक्कारी में यूँ इस-क़दर भी कोई बहरा होता
क्या कहें 'धरम' कि आब-ओ-हवा उसकी थी
नहीं तो जुर्म उसका इस-क़दर न फहरा होता
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