Monday, 13 October 2014

रहा हूँ मैं

न जाने किस उम्मीद में जल रहा हूँ मैं
सर्द के मौसम में भी पिघल रहा हूँ मैं

फ़ैल चुका है अब तो अँधेरा मेरे चार-ओ-सू
फिर भी मंज़िल की ओर निकल रहा हूँ मैं

न तो कोई हमसफ़र है और न कोई राहगर
अब तो गिरकर खुद से ही संभल रहा हूँ मैं

पड़ी है जो ज़माने की लात पेट और दिल पर
कुछ इस तरह से थोड़ा थोड़ा बदल रहा हूँ मैं



Sunday, 5 October 2014

क्या किये जा रहा है ?

किसका ग़म है जो तुझे खाए जा रहा है
वो कौन है यहाँ जो तुझे भुलाये जा रहा है

पलटकर देखो तुझे कोई नहीं अपनाये जा रहा है
फिर क्यों तुम अपने आप में भरमाये जा रहा है

मुद्दतों बाद आज फिर तुमने जो देखा है आईना
देखकर खुद अपने अक्स को शर्माए जा रहा है

लफ़्ज़ों की कशिश में बेदिली औ" ये हर्फ़-ए-मोहब्बत
फिर भला क्यूँ तुम मुझे झूठे किस्से सुनाए जा रहा है

यहाँ तो हर ओर फैली है आफताब की रौशनी
तब भला तुम क्यूँ ये चिराग जलाये जा रहा है

सीने से अपना दिल निकालकर उसे चूम रहे हो
कौन है जो अपने होने का एहसास कराए जा रहा है

महफ़िल ख़त्म हुई सारे कद्रदान जा चुकें हैं "धरम"
अब भला तुम किसको आखों से पिलाये जा रहा है

ज़िंदगी की सवारी

भटक रहा हूँ अनजान राहों पर पूरा छलनी है दिल
अनेक चौखट चूमा हूँ फिर भी नहीं मिली है मंज़िल  

तबीयत से प्रयास किया चढ़ाये अकीदत के भी फूल
बावजूद इसके लगता है ऐसा की कुछ हो रही है भूल

जन्म से जनाज़े तक का सफर होता नहीं है इतना आसाँ
एक ही ज़िंदगी में बनते-टूटते हैं कितने सपनों के मकाँ

बिना ज़ख्म के रिस रहा हैं लहू अब तो यहाँ पत्थरों से
आफताब खुद मांग रहा हैं रौशनी गर्दिश के सितारों से

हर्फ़-ए-इबादत घुल गया हैं मिट्टी में अब दिखाई नहीं देता
भूख से बिलख रहा हैं इंसान मगर ये शोर सुनाई नहीं देता

दिल के हरेक मसले पर "धरम" अब तो दिमाग भारी हैं
ज़िंदगी की दौड़ में रिश्ता इंसानियत का बस एक सवारी हैं 

Thursday, 2 October 2014

तेरा नाम चाहता है

हर शख्स तेरा ही सलाम चाहता है
तेरे लबों पर अपना नाम चाहता है

ख़ुदा ने बख़्शा है जो दौलत-ए-हुस्न तुमको
उसे पाकर अपने मुक़द्दर का इनाम चाहता है

गर्दिश का सितारा हर शब निकल कर चूमता है
तुझे झुककर सलाम करता है और फिर झूमता है

इस शहर में मुझ जैसा कोई दूसरा नहीं "धरम"
जो उसको हर रोज सुबह-ओ-शाम चाहता है 

Saturday, 27 September 2014

चंद शेर

1.
ये अकीदत के फूल हैं हर बाग़ में यूँ ही नहीं खिलते हैं
मोहब्बत करने वाले अब तो मुश्किल से ही मिलते हैं


2.
कितना अनजान है मेरे घर का दर-ओ-दीवार भी मुझसे
हर रोज मिलता तो हूँ मगर देखता मुझे हैरत से है

3.
मंज़िल है अभी बहुत दूर सिर्फ गर्द-ए-सफर ही पास है
थामने को यहाँ बस अपने एक हाथ में दूसरा हाथ है

Monday, 22 September 2014

एहसान मैंने कर दिया

खुद अपने क़त्ल का इकबालिया बयान मैंने दे दिया
बाद मेरे मरने के तुम आज़ाद हो ये फरमान मैंने दे दिया

जो भी कुछ हुआ वो सारा ज़ुर्म अपने नाम मैंने ले लिया
कि अपने हबीब-ओ-रक़ीब पर ये एहसान मैंने कर दिया   

Sunday, 21 September 2014

मोहब्बत और हुकूमत

रूदाद-ए-मोहब्बत मैं भूला नहीं हूँ अब भी याद है
वो आधा कब्र औ' आधा दलदल अब भी आबाद है

मोहब्बत की लिखी आयतें अब तो खाक-ए-सियाह है
जो भी बची है मेरी किस्मत उसमे तीरगी बे-पनाह है

मंज़िल का पता भी नहीं निकल गया हूँ राहपैमाई पर
अब तो डर लगता है यहाँ हर किसी की दिलरुबाई पर

दोज़ख़ के बराबर चल रही है यहाँ आदमखोरों की हुकूमत
अब कहीं नहीं मिलता "धरम" किसी इन्शान की सल्तनत

Saturday, 13 September 2014

हम तो धूल हैं

हम तो धूल हैं बस यूँ ही खाक में मिलते रहेंगे
और उठे हमारी आवाज़ तो होठ सिलते रहेंगे

मेरे लहू के रंग से तेरे आरिज़ सुर्ख़ होते रहेंगे
मेरी झोपडी के आग से तेरे महल रौशन होते रहेंगे

तुम मुझे ज़ख्म देते रहो हम तुम्हें मजा देते रहेंगे
तुम बरपाओ कहर हमपर हम तुम्हें आबाद करते रहेंगे

अमीरी-मुफ़लिसी तो यूँ ही बेस-ओ-कम होते रहेंगे
हम लुटकर भी फ़क़ीरी में ज़िंदगी का मजा लेते रहेंगे 

Wednesday, 10 September 2014

मेरी ज़िंदगी!

कितना डूब चूका हूँ कितना डूबना बाकी है
ऐ ज़िंदगी! तेरी गहराई का मुझे अंदाजा नहीं

हरेक डूब में लब से बस एक आह! निकलती है
पुराना ज़ख्म भरता भी नहीं नया निकल आता है

खुद अपने बदन के ज़ख्म को मैं पहचानता भी नहीं
कि किसने दिए हैं कौन ज़ख्म ये अब मैं जानता नहीं

अपनी धड़कन से भी अब ज़िंदगी का एहसास होता नहीं
यहाँ कितनी भीड़ है ज़माने में मगर कोई पास होता नहीं

इन्तहां हो गई फिर भी ज़ख्म का सिलसिला जारी है
मगर ऐ मेरी ज़िंदगी! मेरा तुझपे अब भी एतवारी है 

Wednesday, 3 September 2014

चंद शेर

1.
हवा का रुख किधर का भी हो बुझता मेरा ही चिराग है
हर बार हुकूमत की लड़ाई में डूबता मेरा ही आफताब है