गुजरे वक़्त का एक भी पल हँसीं नहीं देता
मैं ग़म में डूब चुका हूँ कोई ख़ुशी नहीं देता
जलते चराग को हवा का एक झोंका बुझा गया
बुझा हुआ चराग कहीं कोई रौशनी नहीं देता
उसका स्पर्श अन्तः मन को शांति देता था
मैं ग़म में डूब चुका हूँ कोई ख़ुशी नहीं देता
जलते चराग को हवा का एक झोंका बुझा गया
बुझा हुआ चराग कहीं कोई रौशनी नहीं देता
उसका स्पर्श अन्तः मन को शांति देता था
अब कोई भी स्पर्श वैसी अनुभूति नहीं देता
ज़माने ने मुझपे इतनी मेहरबानियाँ की है
की अब तो कोई ख़ुशी भी ख़ुशी नहीं देता
ज़माने ने मुझपे इतनी मेहरबानियाँ की है
की अब तो कोई ख़ुशी भी ख़ुशी नहीं देता
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