Sunday, 28 July 2013

धुंधला दीखता है

नींद मुझे अपने आगोश में लेकर
एक वीरां जंगल में छोड़ आया है
जहाँ से सब कुछ धुंधला दीखता है
ठीक उसी दिवा स्वप्न की तरह
जहाँ एक बेशक्ल की बाहों में मैं झूलता
जिंदगी की थोड़ी बहुत खुशियाँ महशूस करता हूँ

जब भी कभी कागज़ और पेन्सिल लेकर
उस बेशक्ल की स्केच बनाता हूँ
पता नहीं क्यूँ  स्केच पूरा नहीं हो पाता
स्केच को अधूरा छोड़कर
मैं गहन चिंतन में डूब जाता हूँ
कई तरह के विचारों का उफान
अंतर्मन झेलता रहता है

मैं भला स्केच क्यूँ बनाता हूँ
क्या हमेशा ख़ुशी को शक्ल देना जरुरी होता है ?
यह प्रश्न निरुत्तर ही रह जाता है
वीरां जंगल में सब कुछ धुंधला दीखता है

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