Saturday, 20 July 2013

गिद्ध और चमगादड़

गरुड़ की खाल ओढ़े गिद्ध
सभा में नाचता
मद में फूलता
घोर गर्जन कर
छुपाता अपने पैने नुकीले चोंच
लगा है रक्त मानव का

अनेक चमगादड़ हैं उसके जासूस
रात के अँधेरे में
चुपके से घर में घुसकर देखता
कहीं कोई भर पेट खाया तो नहीं

बिलखता भूख से बच्चा
माँ की गोद में सिसकियाँ लेता
बस खाकर स्नेह की थपकी
रात्रि के अँधेरे में खो जाता
पछताता
भला यह जन्म ही क्यूँ हुआ
देखकर ऐसी बात
तृप्त होता चमगादड़

चमगादड़ ढूंढता है
कहीं कोई हो ऐसा मानव
कि जिसने पाया भूख पर विजय
पाकर ऐसी विलक्षण बात
भला चमगादड़ तब क्यूँ  छुपा रहता
सटकर कान से मानव के गुजरता
फुसफुसाता धमकियों भरा शब्द
और कराता अपने होने का एहसास

मगर वह मानव भी अकड़कर बोलता
कि मैंने पा लिया अब भूख पर विजय
लपेटकर अपने पंख में चमगादड़
मानव को डराता
पहचानो इस घुटन को
हवा मुफ्त में नहीं मिलती यहाँ
चीरकर चमगादड़ के पंख
मुक्त होता मानव
लेता जीवन दायिनी स्वांस

करता आश्चर्य चमगादड़
कि इस मरघट में यह है कौन
वह चमगादड़, मानव के
उस नस्ल को नहीं पहचानता
उड़कर चला वह गिद्ध को बतलाने
कि मुर्दा बोलता है

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