Thursday, 7 November 2013

तेरी महफ़िल

अपनी महफ़िल में मुझे बुलाओ तेरी रुसवाई कम हो जायेगी
जो तुम मुझसे करो गुफ़तगू  तो तेरी तन्हाई कम हो जायेगी

तेरी महफ़िल में ज़माने भर का ग़म था तुम्हारा अपना भी ग़म था
मगर जो बरपा रही थी तुम औरों पर बताओ वो कैसा सितम था

यूँ तो तुम्हारे कई चाहने वाले होंगे जो सराहेंगे भी निबाहेंगे भी
गर जो हो वफ़ा की बातें तो तुझे लोग झुठलाएंगे भी भुलायेंगे भी  

दूर आसमां में कभी अमावस में एक रात महताब उतरा था
बाद मेरे ज़हन में कितना दर्द उतरा था कैसा ख्वाब उतरा था

जो तुझको देखूं तो हुस्न परेशां दीखता है इश्क़ बे-निशां दीखता है
तेरी महफ़िल में "धरम" न मैं दीखता हूँ न मेरा नक़्शे-पां दीखता है

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