1.
चीरकर अपना सीना वो लम्हा निकाल फेंकूँ
कि अब तो मैं सुकूँ पाऊँ ज़िंदगी आसाँ बनाऊँ
2.
उसका सितम मुझपर करम बनकर बरस पड़ा
मुझे अब यकीं है पत्थर में कोई ख़ुदा बसता है
3.
हवस यूँ ही बे-पर्दा होकर नाचता है सड़क पर
इश्क़ परदे में जवाँ है इज्ज़त से रहता भी है
चीरकर अपना सीना वो लम्हा निकाल फेंकूँ
कि अब तो मैं सुकूँ पाऊँ ज़िंदगी आसाँ बनाऊँ
2.
उसका सितम मुझपर करम बनकर बरस पड़ा
मुझे अब यकीं है पत्थर में कोई ख़ुदा बसता है
3.
हवस यूँ ही बे-पर्दा होकर नाचता है सड़क पर
इश्क़ परदे में जवाँ है इज्ज़त से रहता भी है
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