Thursday, 15 January 2015

ज़िंदगी की मुश्किलें

ज़िंदगी से शिकस्त भी खाया है ज़माने ने सिखाया भी है
गैरों से जो नामुमकिन था उसे अपनों ने दिखाया भी है

ज़िंदगी की तमाम शोहरतें अपने हाथों से मिटाया भी है
कोरे कागज़ पर गुमनामी खुद किस्मत ने लिखाया भी है

गैरों की सरजमीं पर इश्क़ का मकाँ मैंने बनाया भी है
मेरे हरेक रक़ीब ने तो उसका एक-एक ईंट लुटाया भी है

ताउम्र प्यासा रखकर बुढ़ापे में खून का घूँट पिलाया भी है
ज़िंदगी के हरेक लम्हे को कुरेदकर उसने मुझे रुलाया भी है

अपने मुहब्बत की याद में मैंने उसका एक बुत लगाया भी है
ज़माने के नज़र से अपने ही बुत को खुद उसने चुराया भी है

पत्थर से दिल में मैंने "धरम" जज़्बात भरा रिश्ता उगाया भी है
उसने रिश्ते को दफनाकर ज़िंदगी की मुश्किलों को बताया भी है 

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