Monday, 5 January 2015

कब्र सजाना बाकी है

दिल जल चुका है अब जिस्म जलना बाकी है
मेरे अरमानों का कुछ और मचलना बाकी है

वो पत्थर अभी पूरी तरह से गिरा नहीं है मुझपर
सर कुचला गया है अब जिस्म कुचलना बाकी है

मेरे आँख के लहू का दरिया है जो तेरे शहर तक फैला है  
गैर तो इससे निकल चुके हैं तुम्हारा निकलना बाकी है

तेरी वो दरियादिली और मेरा ये ज़ख्म-ए-दिल "धरम"
महफ़िल कई बार सज चुकी है अब कब्र सजाना बाकी है

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