गुजरे वक़्त का ये कैसा तकाजा है
वो पुराना ज़ख्म अब भी ताजा है
हरेक याद रिश रहा है इस ज़ख्म से
उसकी यादों का ये कैसा खामियाज़ा है
कहाँ किसी महफ़िल में है वो रौनक-ए-हस्ती
बिना उसके तो हरेक अंजुमन अब बेमज़ा है
"धरम" मेरी नज़रों को ये कैसा धोखा हो रहा है
कि जिधर भी देखूं दिखता मेरा ही जनाज़ा है
वो पुराना ज़ख्म अब भी ताजा है
हरेक याद रिश रहा है इस ज़ख्म से
उसकी यादों का ये कैसा खामियाज़ा है
कहाँ किसी महफ़िल में है वो रौनक-ए-हस्ती
बिना उसके तो हरेक अंजुमन अब बेमज़ा है
"धरम" मेरी नज़रों को ये कैसा धोखा हो रहा है
कि जिधर भी देखूं दिखता मेरा ही जनाज़ा है
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