Wednesday, 1 April 2015

ऐसा क्यूँ है

यहाँ हवा में आज इतनी घुटन क्यूँ है
हरेक चेहरे पर एक अजीब शिकन क्यूँ है

किसके मुट्ठी में क़ैद है हम सब की ज़िंदगी
यहाँ आज सब के बदन पर क़फन क्यूँ हैं

किस डर से झुकी है नज़र औ" सिले हैं होंठ  
सीने में खुद अपनी ही आवाज़ दफ़न क्यूँ है

सांस ठंढी पड़ चुकी है लहू भी पानी हो चला है
मगर फिर भी बदन में ये अजीब तपन क्यूँ है

इस बस्ती को तो कितनों ने उजाड़ा है "धरम"
मगर हरेक दाग बस हमारे ही दामन क्यूँ है

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