Sunday, 5 April 2015

चंद शेर


1.
अपना ज़ख्म सहलाता हूँ खुद से रुबरू हो जाता हूँ
गर मिले ख़ुशी तो खुद से फ़ासले पर हो जाता हूँ

2.
ये मेरे अपने ज़ख्म हैं ये मुझे ख़ुशी देते हैं
हसीं चेहरे तो अब बस मुझे बेरुखी देते हैं

3.
सितमगर अगर तुझ सा हो तो कोई परहेज नहीं
दिल काट के गिर जाये फिर भी कोई गुरेज नहीं

4.
इस शहर की ये आवो-हवा मेरे तबियत का नहीं है
तो किसी और का प्यार है मेरे किस्मत का नहीं है

5.
यहाँ अंधेर अब भी कायम है मगर चिराग जल रहा है
मुफलिसी पेवस्त है ज़िंदगी में मगर ख्वाब पल रहा है

6.
मेरे हरेक शिकस्त पर उसका अंदाज़-ए-लुत्फ़ गज़ब था
महज़ एक ही जीत उसके सैलाब-ए-गिरिया का सबब था


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