Sunday, 12 April 2015

चंद शेर

1.

एक बार फिर नए ज़ख्म से वही पुराना रिश्ता निकला
मेरे दोस्त से मेरा फिर वही रक़ीब का वास्ता निकला


2.

मुद्दतों उदास था की एक शाम ख़ुशी मिली
वक़्त की पावंद थी सुबह ही निकल गई

3.

तेरे आरज़ू का क़ाफ़िला तेरे ज़ख्मों का वो सिलसिला
तेरी ज़ुस्तजू ने मुझको फ़क़त दिया है कुछ ऐसा सिला 

No comments:

Post a Comment

Note: only a member of this blog may post a comment.