आधा जीवन तो भसड़ में ही कट गया सिर्फ एक ही पोटली ढोते-ढोते. घर से जब निकला था तब पास में सिर्फ दसवीं कक्षा का अंक पत्र था. पोटली बहुत हल्की थी इसलिए मन भी हल्का रहता था. साल-दर-साल पोटली में कागज़ के अंक पत्र, चरित्र प्रमाण पत्र और न जाने कैसे-कैसे पत्र जुड़ते गए. हक़ीक़त अब यह है की पोटली के साथ-साथ मन भी भारी हो गया है. शरीर स्थूल हो चला है. तोंद हर वक़्त अपने होने का एहसास कराते रहता है. हड्डी वक़्त-बे-वक़्त कट-कट की आवाज़ करते रहता है. पता नहीं क्या कहना चाहता है: तुम्हारा कट चुका है या कट रहा है या फिर तुम चूतिये हो और ज़िंदगी भर तुम्हारा ऐसे ही कटने वाला है? कभी-कभी मन दार्शनिक भाव से ओत-प्रोत होता है तो यह आत्मबोध होता है कि आदमी अपना खुद जितना काटता है दुनियाँ में उसका उतना कोई भी दूसरा नहीं काट सकता है. तो फिर इतना भसड़ क्यूँ? इतना ग़दर क्यूँ? इतनी बेचैनी क्यूँ? इतनी बेवाकी क्यूँ? ऐसे-ऐसे अनगिनत ढेर सारे प्रश्न उठने लगते हैं. बाद इसके पता चलता है कि दार्शनिक मन इतना खिन्न क्यूँ होता है. घोर खिन्नता में भी यदि करवट बदलता हूँ तब भी हड्डी कट-कट करने से बाज नहीं आता है. लेकिन इसबार हड्डी का कटकटाना ठीक लगता है क्यूंकि वह अकिंचन दार्शनिक हुए मन को काटता है और फिर मनःस्थिति सामान्य हो जाती है. रात में सोने के वक़्त एहसास होता है कि ये दिन भी कट ही गया.
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