क्या जाने किस मुकाम तक अब आ गया हूँ मैं
कि जिस्म में उतरकर जान तक अब आ गया हूँ मैं
वफ़ा की बात है तुम्हारी तुम खुद अपना जानो
कि अपनी तरफ से ईमान तक अब आ गया हूँ मैं
अब ये तुझ पर है कि मुझे पी लो या फिर छोड़ दो
कि बनकर शराब तेरे ज़ाम तक अब आ गया हूँ मैं
बातें बेरुखी कि थी तुम याद रखो या फिर भूल जाओ
कि सब छोड़कर दुआ-सलाम तक अब आ गया हूँ मैं
तुम चाहो तो पनाह दो मुझे या फिर कर दो दरकिनार
कि तेरे हुस्न के इस मकान तक अब आ गया हूँ मैं
तुम चाहो तो पलकों पे रखो या मुझसे फेर ही लो नज़र
कि तेरी मोहब्बत में इस अंजाम तक अब आ गया हूँ मैं
मेरी रुस्वाई हर जुबाँ पर है औ" हिकारत हर नज़र में है
कि ज़माने में "धरम" इस अंजाम तक अब आ गया हूँ मैं
कि जिस्म में उतरकर जान तक अब आ गया हूँ मैं
वफ़ा की बात है तुम्हारी तुम खुद अपना जानो
कि अपनी तरफ से ईमान तक अब आ गया हूँ मैं
अब ये तुझ पर है कि मुझे पी लो या फिर छोड़ दो
कि बनकर शराब तेरे ज़ाम तक अब आ गया हूँ मैं
बातें बेरुखी कि थी तुम याद रखो या फिर भूल जाओ
कि सब छोड़कर दुआ-सलाम तक अब आ गया हूँ मैं
तुम चाहो तो पनाह दो मुझे या फिर कर दो दरकिनार
कि तेरे हुस्न के इस मकान तक अब आ गया हूँ मैं
तुम चाहो तो पलकों पे रखो या मुझसे फेर ही लो नज़र
कि तेरी मोहब्बत में इस अंजाम तक अब आ गया हूँ मैं
मेरी रुस्वाई हर जुबाँ पर है औ" हिकारत हर नज़र में है
कि ज़माने में "धरम" इस अंजाम तक अब आ गया हूँ मैं
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