निकले जो लुटिया डूबने को उनसे कैसे हो सत्कर्म
की पीटते हैं ढोल अपने नाम का करके सारे कुकर्म
कर के सारे कुकर्म भरी भीड़ में सब से आँख लड़ाये
लिए हैं स्वप्न मन में की जनता को भी खूब ये भाये
की जनता को भी खूब भाये सब उलटी सीधी इसकी
लगे हैं लोग कहने की क्या खूब पीते हैं ये व्हिस्की
उतरा नशा जब आशव का करने लगे सबको प्रणाम
अनायाश ही उनके मुख से भी फूट गया जय श्री राम
फूट गया जय श्री राम की अब लगे हैं माथा वो टेकने
उतारकर सर से टोपी "धरम" अब माला लगे हैं जपने
की पीटते हैं ढोल अपने नाम का करके सारे कुकर्म
कर के सारे कुकर्म भरी भीड़ में सब से आँख लड़ाये
लिए हैं स्वप्न मन में की जनता को भी खूब ये भाये
की जनता को भी खूब भाये सब उलटी सीधी इसकी
लगे हैं लोग कहने की क्या खूब पीते हैं ये व्हिस्की
उतरा नशा जब आशव का करने लगे सबको प्रणाम
अनायाश ही उनके मुख से भी फूट गया जय श्री राम
फूट गया जय श्री राम की अब लगे हैं माथा वो टेकने
उतारकर सर से टोपी "धरम" अब माला लगे हैं जपने
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