कि शूली पर यहाँ झूलते हैं माई के लाल
औ" खादी में हैं छुपे एक से एक दलाल
कि एक से एक दलाल करते हैं ता ता थैया
जहाँ भी देखो हैं इन्हीं के बाप या तो भैया
कि बाप हो या भैया हैं पकडे सबके ये रोटी
कहते कि चाहिये रोटी तो देना होगा बोटी
कि देना होगा बोटी नहीं तो ना गलेगी दाल
तेरे लिए तो है यहाँ अब सूखा और अकाल
कि सूखा और अकाल ग़ज़ब है इनकी माया
जनता भी लगी सोचने क्यूँ इससे भरमाया
कि क्यूँ इससे भरमाया अब नहीं सुनेंगे इसकी
चाहे बन जाये सरकार यहाँ अब जिसकी तिसकी
कि जिसकी तिसकी झोली में भी भरा हुआ है सांप
अपनी जनता सोचकर इस पर जाती है अब काँप
कहत कवि धरम हुआ खूब विकाश पर हास-परिहास
सब चलें अब अपने काम पर कि खूब हुआ बकवास
औ" खादी में हैं छुपे एक से एक दलाल
कि एक से एक दलाल करते हैं ता ता थैया
जहाँ भी देखो हैं इन्हीं के बाप या तो भैया
कि बाप हो या भैया हैं पकडे सबके ये रोटी
कहते कि चाहिये रोटी तो देना होगा बोटी
कि देना होगा बोटी नहीं तो ना गलेगी दाल
तेरे लिए तो है यहाँ अब सूखा और अकाल
कि सूखा और अकाल ग़ज़ब है इनकी माया
जनता भी लगी सोचने क्यूँ इससे भरमाया
कि क्यूँ इससे भरमाया अब नहीं सुनेंगे इसकी
चाहे बन जाये सरकार यहाँ अब जिसकी तिसकी
कि जिसकी तिसकी झोली में भी भरा हुआ है सांप
अपनी जनता सोचकर इस पर जाती है अब काँप
कहत कवि धरम हुआ खूब विकाश पर हास-परिहास
सब चलें अब अपने काम पर कि खूब हुआ बकवास
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