Friday, 5 May 2017

किशोरावस्था में घुड़कना

तुमने थोड़ा सा वक़्त दिया था मुझे
खुद में पनपने को
मैं तब बस उस रिश्ते में
घुड़कना सीख ही रहा था
कभी तेरा सहारा मिलता
तो उसे थामकर
छन भर खड़ा हो पाता था
हाँ! मगर फिर गिरने के बाद
कराह नहीं निकलती थी दिल दुखता नहीं था
कुछ उम्मीद थी मन में

थोड़ा वक़्त और गुज़रा था तेरे साथ
मैं बिना सहारे
थोड़ी थरथराहट के साथ खड़ा हो पाता था
बाद उसके तेरे सहारे
मेरे पैर ज़मीं पर टिकने लगे थे

मुझे अब भी याद है
मैंने बिना चलने का अभ्यास किए
तेरे साथ सीधा दौड़ा ही गया था
मगर उस दौड़ के बाद
बुनियाद हिलने लगी थी

ये कहाँ पता था
की दौड़ने के पहले चलना आना चाहिए
वो पहली दौड़ ही आखिरी दौड़ हो गई
औ" बाद उसके
उस रिश्ते में घुड़कना भी मुमकिन न रहा

किशोरावस्था में किसी का घुड़कना
खड़ा होना और फिर एकदम से दौड़ पड़ना
बाल्यावस्था में घुड़कने खड़ा होने और फिर
एकदम से दौड़ने पड़ने से बिलकुल अलग होता है


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