समंदर की ख़ामोशी अपनी गहराई को बयाँ करती है
औ" उसके बवंडर की दास्ताँ दूसरे की ज़बाँ करती है
औ" उसके बवंडर की दास्ताँ दूसरे की ज़बाँ करती है
जब इश्क़ होता है तो प्याला-ए-हुस्न बे-वजूद हो जाता है
ख़ुलूस-ए-दिल से जलाई गई आग अँधेरा कहाँ करती है
क़लम की दौलत है तो काग़ज़ ख़ुद-ब-ख़ुद मिल जायेगा
दास्ताँ इसकी हर संग पर लिखी बातें यहाँ-वहाँ करती है
उलफ़त के लफ़्ज़ बंद क़िताबों में क़ैद नहीं रह सकते
दास्ताँ इसकी धरती आसमाँ औ" सारा जहाँ करती है
इंसाफ़ का सिर्फ़ एक तराजू औ" हर तन से जुदा सर
बड़ी शिद्दत से इंतिज़ार "धरम" नज़र-ओ-जाँ करती है
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