उस एक बिखरी याद से जब किनारा कर लिया
बज़्म में गया भी नहीं मगर हाँ नज़ारा कर लिया
कि शिकस्त-ओ-फ़त्ह का ख़याल आया ही नहीं
जब उस शख़्स से मोहब्बत क़ज़ारा कर लिया
बज़्म में गया भी नहीं मगर हाँ नज़ारा कर लिया
कि शिकस्त-ओ-फ़त्ह का ख़याल आया ही नहीं
जब उस शख़्स से मोहब्बत क़ज़ारा कर लिया
दुश्मन के कंधे पर सर रखा फिर न ख़बर रखा
ज़िंदगी में कभी एक ऐसा भी सहारा कर लिया
दरमियान दो दिलों के जब फ़ासला बढ़ता गया
वो नज़र झुकाने से पहले एक इशारा कर लिया
जहाँ बैठे थे मुंतज़िर सारे क़यामत के दीदार में
जब वहाँ शरीक हुए दिल को आवारा कर लिया
जब दश्त-ब-दश्त बीतता गया तन्हाई बढ़ती गई
तब सफ़र में "धरम" ख़ुद को पुकारा कर लिया
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