न मैंने कभी बुलाया था न ही तुम ख़ुद आये थे
वो एक लम्हें की बेबसी थी वो कैसा विसाल था
वो एक लम्हें की बेबसी थी वो कैसा विसाल था
राख हो चुकी सारी यादों को हवा उड़ा रही थी
दिल में तिरे कैसी अगन थी वो कैसा ख़याल था
अश्क़ औ" लहू एक दूसरे के क़र्ज़दार बन गए
ख़ुद से वो कैसी गुफ़्तगू थी वो कैसा सवाल था
ख़ामोशी की उम्र दराज़ हुई चीख सुकूँ से सो गया
दरमियाँ ज़िंदगी और मौत के वो कैसा मआ'ल था
तन्हाई की क़ब्र पर उपजी और फैलती ज़िंदगी
सुकूँ को बेचैनी पर "धरम" वो कैसा 'अयाल था
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