Monday, 10 October 2022

वो ख़ूब रुलाने लगे

नींद बोझिल होने लगी कुछ ख़्वाब ऐसे आने लगे 
कैसे रुई से पत्थर तोड़कर बर्फ़ से पिघलाने लगे 

क्यूँ कोई भी चेहरा दुबारा कभी नज़र नहीं आया  
तेरी महफ़िल से निकलकर लोग कहाँ जाने लगे

ख़्वाबों से बनी दीवारें  ढ़ेर सारे ख़त से ढ़ला छत  
किसी मुंतज़िर को कब चैन की नींद सुलाने लगे 

आईने ने धीरे से कुछ कहा अक्स से नज़रें मिली 
फिर आँखों से आँखें चूमकर वो ख़ूब रुलाने लगे 

दिल में था तो दश्त था क़दमों से उतरी ख़ाक थी
ख़ुद के अंदर लोग न जाने  क्यूँ आग जलाने लगे   

सितारे अर्श के "धरम" अब ज़मीं को तकते नहीं    
सिरहाने में ख़ुद चाँद रखकर  नींद सुलगाने लगे  

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