नींद बोझिल होने लगी कुछ ख़्वाब ऐसे आने लगे
कैसे रुई से पत्थर तोड़कर बर्फ़ से पिघलाने लगे
क्यूँ कोई भी चेहरा दुबारा कभी नज़र नहीं आया
तेरी महफ़िल से निकलकर लोग कहाँ जाने लगे
ख़्वाबों से बनी दीवारें ढ़ेर सारे ख़त से ढ़ला छत
किसी मुंतज़िर को कब चैन की नींद सुलाने लगे
आईने ने धीरे से कुछ कहा अक्स से नज़रें मिली
फिर आँखों से आँखें चूमकर वो ख़ूब रुलाने लगे
दिल में था तो दश्त था क़दमों से उतरी ख़ाक थी
ख़ुद के अंदर लोग न जाने क्यूँ आग जलाने लगे
सितारे अर्श के "धरम" अब ज़मीं को तकते नहीं
सिरहाने में ख़ुद चाँद रखकर नींद सुलगाने लगे
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