Sunday, 16 October 2022

फिर ज़माना संभलने लगा

कुछ देर तो साथ अच्छा रहा फिर चेहरा जलने लगा 
पहले हाथ से हाथ छूटा  फिर क़दम  फिसलने लगा
  
न तो नज़रों ही से कह पाया  न ही होठों से बयाँ हुई 
औ" काग़ज़ पर जो लिखा  वो कलाम पिघलने लगा  

जो अपनी हद में रहा  वो हर किसी की  ज़द में रहा  
दीवार हद की गिराई तो फिर ज़माना संभलने लगा 

होठों पे तबस्सुम था औ" चेहरा भी उसका साफ़ था  
सितमगर करके सितम ख़ुद हाथ अपना मलने लगा 

जब ज़मीं के  ख़्वाब को कोई  अपना आसमाँ मिला 
तब होंठ आधा खुला रहा  मगर आधा  सिलने लगा   

जब हक़ीक़त मर गई 'धरम' सिर्फ़ वहम ज़िंदा रहा
तब हर लाश को लहराता  एक कारवाँ चलने लगा 

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