महज़ एक कदम चला बाद उसके बढ़ न सका
ये कैसी बुलंदी है कि कोई भी वहाँ चढ़ न सका
आँखों में जब भी आँखें डाली नज़रें झुकने लगी
रु-ब-रु तो हुआ मगर निगाह कभी पढ़ न सका
इश्क़ ने जब चेहरा खोला फ़न सारा नाकाम रहा
सिर्फ़ चादर लटकाया मूरत उसकी गढ़ न सका
धुवाँ होने लगा सब हर्फ़ क़लम दम तोड़ने लगा
कोई भी नज़्म 'धरम' चेहरा उसका मढ़ न सका
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