कि लहू जब भी ज़मीं पर उतरा रौशनाई बनकर बहने लगा
फिर ज़माना उसमें कलम भिंगोकर बात अपनी कहने लगा
सिर्फ़ नज़रों का ही धोख़ा न था थोड़ी ख़ता साँसों की भी थी
क़ाबिल-ए-क़त्ल-ए-रुस्वाई यार बनकर साथ अब रहने लगा
कोई रिश्ते की बुलंदी न थी बस बीच का कोई वाक़ि'आ था
बस नज़र मिलाकर मुस्कुराया फिर हर सितम सहने लगा
वादे फ़िज़ाओं में घुलकर हवा को 'अजब इशारा करने लगे
साँसों में आते-जाते वादों के जोर से कलेजा फिर ढ़हने लगा
चिंगारी चराग़-ए-दिल ने दी जिससे एक आग बदन में लगी
फिर न जाने क्यूँ 'धरम' जिस्म के बदले दिल ही दहने लगा
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