ख़ुद से भी मिलने के लिए कभी फ़रियाद करना पड़ता है
तन्हा वक़्त काटने के लिए क्या क्या याद करना पड़ता है
ख़ुद के क़िरदार से यूँ आसाँ नहीं ख़ुद को अलग करना
अपने रूह को अपने जिस्म से आज़ाद करना पड़ता है
ग़म हर दिल में यूँ ही पनाह नहीं लेता सुकूँ से नहीं रहता
ग़म को पनाह देने के लिए दिल को साद करना पड़ता है
ख़्वाब में जीना रंज-ओ-ग़म को पीना कुछ आसाँ तो नहीं
ये हुनर पाने के लिए कितना कुछ बर्बाद करना पड़ता है
कि बाद एक मर्तबा के दूसरे रुतबे की ख़्वाहिश नहीं हो
इसके लिए ख़ुद को ख़ुद ही से फ़साद करना पड़ता है
एक शक्ल दिखानी पड़ती है एक चेहरा छुपाना पड़ता है
ख़ुद का ही चेहरा 'धरम' ख़ुद को ईजाद करना पड़ता है
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