जो तुम थक चुके हो तो मंज़िल भी क्यूँ तिरा ख़याल करे
ग़र ख़याल करे भी तो फिर बची ज़िंदगी का ज़वाल करे
बीच का कोई रास्ता नहीं या साथ होना या तो मर जाना
इश्क़ अजीब है क़रीब जाने का कोई कैसे मजाल करे
वफ़ाई का न कोई किरदार न कोई चेहरा नज़र आता है
ये ऐसा मंज़र है ग़र कोई देखे तो आँखों का कलाल करे
मज़लूमों का कोई क़ाफ़िला जब भी तख़्त-नशीं से मिले
क्या हुक्म है हर कोई अपने चेहरे पर ख़ुशी बहाल करे
ये उनकी रहम-दिली की मौत इतनी आसान नसीब हुई
औ" ये हुक्म भी की हर मुर्दा तौर-ए-क़त्ल का जलाल करे
अजीब प्यास है ये गले से चढ़ती है आँखों से उतरती है
ख़्वाहिश-ए-लहू-ए-दरिया है 'धरम' कोई क्या सवाल करे
ज़वाल - पतन
कलाल - किसी अंग या संवेदना का शुन्य हो जाना
जलाल - महत्ता
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