इंसाफ़ का तराजू भी कोई इनाम-ए-ईमान न दे सका
'उरूज हासिल तो हुआ मगर कोई उड़ान न दे सका
ख़ुद से मिला तो चेहरे पर अदब ने ऐसा दस्तक़ दिया
हादिसों का सिलसिला भी शक्ल-ए-वीरान न दे सका
वो जाना पहचाना अश्क भी जानी पहचानी आँखें भी
ख़याल में शक्ल उभरा मगर कोई पहचान न दे सका
हर्फ़ से हर्फ़ का जुड़ना औ" फ़ासला रूहों का बढ़ना
एक भी मुलाक़ात कोई एहसास-ए-अंजान न दे सका
कि अपने क़त्ल के बाद भी वो मुंसिफ़ तख़्त-नशीं था
कैसा शख़्स था जो ताज को कोई अरमान न दे सका
उजड़ा शजर दूर तक वो सन्नाटा बादल में छुपा चाँद
एक भी लम्हा "धरम" वो ख़ुद को सुनसान न दे सका
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