वो बात कहाँ कोई कदम साथ रखने या उठाने की थी
दरमियान दोनों के जो भी बात थी सिर्फ़ ज़माने की थी
कि समंदर तैर भी जाते मगर हासिल क्या ही होना था
कि शुरू से ही बात जब एक दूसरे को भुलाने की थी
इश्क़ मोहब्बत फ़रियाद तकल्लुफ़ कुछ भी बचा नहीं
सब जलकर राख हो गया बात इसी आशियाने की थी
शाख़ें दरख़्तों की कट गई घर परिंदों का उजड़ गया
बस जरा सी बात थी बात परिंदों के चहचहाने की थी
मिलें तो नज़र चुराना राख़ यादों का फूँककर उड़ाना
अब दोनों में जो भी बातें बची थी दिल दुखाने की थी
था तो वो एक समंदर मगर दोनों किनारा दिखता था
एक दरिया-ए-इश्क़ में "धरम" बात डूब जाने की थी
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