Sunday, 12 January 2025

बात डूब जाने की थी

वो बात कहाँ कोई कदम साथ रखने या उठाने की थी 
दरमियान दोनों के जो भी बात थी सिर्फ़ ज़माने की थी

कि समंदर तैर भी जाते मगर हासिल क्या ही होना था   
कि शुरू से ही  बात जब एक दूसरे को भुलाने की थी
    
इश्क़ मोहब्बत फ़रियाद तकल्लुफ़ कुछ भी बचा नहीं 
सब जलकर राख हो गया बात इसी आशियाने की थी

शाख़ें दरख़्तों की कट गई  घर परिंदों का उजड़ गया
बस जरा सी बात थी बात परिंदों के चहचहाने की थी

मिलें तो नज़र चुराना राख़ यादों का फूँककर उड़ाना   
अब दोनों में जो भी बातें बची थी  दिल दुखाने की थी

था तो वो एक समंदर मगर दोनों किनारा दिखता था
एक दरिया-ए-इश्क़ में "धरम" बात डूब जाने की थी  

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