लब की बात क्या कहें लब पर ख़ामोशी का पहरा है
आँखों झुकी रहती है चेहरे पर जवाब बहुत गहरा है
ख़ुदाई फिर से लौटेगी वक़्त को थोड़ा और ढ़लने दे
लम्बे वक़्त तक पानी भला किसके दर पर ठहरा है
बात उसके मतलब की थी ही नहीं हवा में उड़ गई
अपने लफ़्ज़ों को ज़ाया मत करो वह अभी बहरा है
बातें सितम की हो या सनम की हो कोई फ़र्क़ नहीं
अपनी फ़िज़ा में तो बस ख़ल्वत है दश्त है सहरा है
एक बेचैनी सी है दिल में यादों की क़ब्र ज़ेहन में है
सीने में उठी महज़ लहर है या कोई दर्द सुनहरा है
कि सिर्फ़ वीरानी थी वहाँ कोई जज़्बात था ही नहीं
दिल का क्या कहें "धरम" दिल ता'मीर-ए-सहरा है
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