कुछ दूर तो वह सीढ़ी से चढ़ा फिर उड़ान भरने लगा
मंज़िल तक पहुँचा भी न था की आसमान गिरने लगा
ग़म-गुसारों की महफ़िल थी दिल जलने के किस्से थे
कुछ देर तो वह ख़ामोश रहा फिर बयान करने लगा
ज़ख़्म भी भर चुका था चमड़ी भी नई निकल आई थी
वक़्त ने कुरेदा तो फिर से कुछ निशान उभरने लगा
बात मोहब्बत से करनी थी बात इश्क़ की करनी थी
सामने बस बैठे ही थे कि दिल में तूफ़ान गुज़रने लगा
पहले एक साया दो रूहों से अलग-अलग मिलता था
अब वही साया दोनों रूहों के दरमियान उतरने लगा
दरख़्त की छाँह में 'धरम' हाथ मिलाया दिल-लगी की
फिर दोनों को तन्हा देखा तो बयाबान बिफरने लगा
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