Thursday, 27 March 2025

सूरज ने दमकना छोड़ दिया

क्या हुआ कि सितारों ने चमकना छोड़ दिया
चाँदनी मुरझाई सूरज ने दमकना छोड़ दिया

मक्कारी, फ़रेबी, बे-ईमानी बातें कैसी भी हो 
इन बातों को कहने में झिझकना छोड़ दिया

साक़ी का क़हर हो कि हो रिन्दों की बे-सब्री    
ऐसी बातों पर साग़र ने छलकना छोड़ दिया

मंज़र ज़ुल्म-ओ-सितम का हो या 'उरूज का      
अंदर किसी भी आग ने दहकना छोड़ दिया

बाद चैन-ओ-सुकूँ के भी आँखों में नींद नहीं 
थकन में पलकों ने भी  झपकना छोड़ दिया

आँखों में न अश्क़ रहा न ही लहू रहा 'धरम' 
तन्हाई में साँसों ने भी सिसकना छोड़ दिया 

Tuesday, 18 March 2025

कलियाँ लगती है झुलसाई

जो आँख खुलती है तो बजने लगती है तन्हाई
फूल झड़ जाते हैं  कलियाँ लगती है झुलसाई
 
आँखें जब मिलती है  नज़र लगती है मुरझाई
दरमियाँ दोनों के  कि बातें लगती है बिसराई

जाने किस बात पर चिड़िया लगती है इतराई
शाख को बैठी चिड़िया बस लगती है भरपाई

पहले-पहल पायल उसी ने लगती है झनकाई
कि उसने जो कही वो बातें लगती है दोहराई

वो पुरानी यादें उसकी अब लगती है दफ़नाई 
कि ख़याल आने पर साँसें लगती है अकुलाई 
   
लो उसने कह दी दोनों में लगती है आशनाई
'धरम' जिसकी बातें सबको लगती है भरमाई

Saturday, 8 March 2025

सवालों के घेरे में रहा है

उसका हरेक जवाब सवालों के घेरे में रहा है 
उसे ख़बर न थी कि वो ख़ुद भी अँधेरे रहा है

वहाँ बज़्म में सिर्फ़ इस बात की ही चर्चा रही  
कैसे मुफ़लिस के घर ख़ुर्शीद सवेरे में रहा है

दरमियान दोनों के फ़ासला  आसमाँ जितना 
तो फिर लहज़ा  क्यूँ हमेशा तेरे-मेरे में रहा है

तेरे दर से जब निकला  एक बेचैनी बनी रही  
दिल में सुकूँ रहा जब भी तेरे बसेरे में रहा है

सूरत उसकी याद है या भूल गया  पता नहीं 
कि चेहरे पर अँधेरा हर वक़्त घनेरे में रहा है

बज़्म में जाने से पहले ख़ुद को तौलना 'धरम'
ये इश्क़ भी एक खेल है साँप-सपेरे में रहा है

Wednesday, 5 March 2025

'अजीब मंज़र बना है

जब से क़तरा से कटकर  वो समंदर बना है
क्या कहें अपने माज़ी से भी बे-ख़बर बना है

इसे हाथ का जादू न कहें तो और फिर क्या
सारे मुखौटों का चेहरा  इतना सुंदर बना है

तीर उसने जो चलाया सब निशाने पर लगा 
मत पूछ ये इल्म उसमें किस-क़दर बना है

वहाँ दरख़्तों में अब फ़क़त कील फलते हैं  
ये मत पूछ वहाँ क्या ज़मीं के अंदर बना है

हर मुबारकबाद में ख़ंज़र भी साथ आया है        
दिल ऐसे ही नहीं  ज़ख़्मों का भँवर बना है

बाद मौत के 'धरम' मुर्दों में रूह तलाशना
जिधर भी देखो यही 'अजीब मंज़र बना है 

Monday, 3 March 2025

ख़ुद को निगलकर बना है

ये कैसी तपन है ये क्या पिघलकर बना है 
वो अपनी ही शक़्ल को  बदलकर बना है
  
बुलंदी की हवस है कौन किसका है यहाँ    
ऐसा क़िरदार ख़ुद को निगलकर बना है

आसाँ नहीं होता मंज़िल-ए-मक़्सूद बनना      
वो कितने मंज़िलों को  कुचलकर बना है

वहाँ आसमाँ तक जाने की सीढ़ी लगी है 
वो राह उसके घर से  निकलकर बना है

कील चुभाए रखना हवा का रुख मोड़ना  
वो हुनर है  जो काँटों पर चलकर बना है

ये ऐसी ढ़लान है जहाँ सिर्फ़ फिसलना है 
यहाँ कौन है 'धरम' जो सँभलकर बना है