Monday, 3 March 2025

ख़ुद को निगलकर बना है

ये कैसी तपन है ये क्या पिघलकर बना है 
वो अपनी ही शक़्ल को  बदलकर बना है
  
बुलंदी की हवस है कौन किसका है यहाँ    
ऐसा क़िरदार ख़ुद को निगलकर बना है

आसाँ नहीं होता मंज़िल-ए-मक़्सूद बनना      
वो कितने मंज़िलों को  कुचलकर बना है

वहाँ आसमाँ तक जाने की सीढ़ी लगी है 
वो राह उसके घर से  निकलकर बना है

कील चुभाए रखना हवा का रुख मोड़ना  
वो हुनर है  जो काँटों पर चलकर बना है

ये ऐसी ढ़लान है जहाँ सिर्फ़ फिसलना है 
यहाँ कौन है 'धरम' जो सँभलकर बना है

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