जब से क़तरा से कटकर वो समंदर बना है
क्या कहें अपने माज़ी से भी बे-ख़बर बना है
इसे हाथ का जादू न कहें तो और फिर क्या
सारे मुखौटों का चेहरा इतना सुंदर बना है
तीर उसने जो चलाया सब निशाने पर लगा
मत पूछ ये इल्म उसमें किस-क़दर बना है
वहाँ दरख़्तों में अब फ़क़त कील फलते हैं
ये मत पूछ वहाँ क्या ज़मीं के अंदर बना है
हर मुबारकबाद में ख़ंज़र भी साथ आया है
दिल ऐसे ही नहीं ज़ख़्मों का भँवर बना है
बाद मौत के 'धरम' मुर्दों में रूह तलाशना
जिधर भी देखो यही 'अजीब मंज़र बना है
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