Thursday, 7 August 2014

मैं कौन हूँ

न मैं ख्वाब हूँ न मैं ख्याल हूँ
न गए वक़्त का कोई मिसाल हूँ

न मैं जिस्म हूँ न मैं जान हूँ
न दिल-ए-सुकूँ की पहचान हूँ

न मैं गीत हूँ न मैं साज़ हूँ
न किसी बज़्म की आवाज़ हूँ

न मैं इश्क़ हूँ न मैं हुस्न हूँ
न किसी महफ़िल का जश्न हूँ

न मैं ज़ख्म हूँ न मैं मरहम हूँ 
न किसी दिलरुबा का हमदम हूँ 

न मैं धड़कन हूँ न मैं स्वांस हूँ 
न आगाज़-ए-इश्क़ की आश हूँ 





Saturday, 2 August 2014

चंद शेर

1.
मिटाकर वज़ूद मेरा तुम मुझको भुलाने चले हो
आईने में खुद अपनी शक्ल को झुठलाने चले हो

2.
अपने बज़्म में हर रोज बरपा के क़हर मुझपर
किस्सा-ए-दरियादिली दुनियाँ को सुनाने चले हो

3.
आसमाँ का सितारा हूँ बस दूर से ही प्यारा हूँ
अपनी तपिश में जलता हूँ औ" खड़ा बेसहारा हूँ

4.
कद्र-ए-इश्क़ की "धरम" अब कहाँ किसे है होश
बस मय का चार प्याला और हो गए मदहोश  

5.
तुझसे मरासिम था तो क़त्ल-ए-आम हो गया
इस शहर का हर मकाँ अब तो वीरान हो गया

6.
जला के दिल इन्शाँ का बुत को रौशन कर दिया
तुमने तो पाक-ए-इश्क़ को भी ग़ारत कर दिया

7.
एक नई सुबह की आश है कुछ बचा अभी भी खास है
सारा जग है तेरा अपना रे मन! फिर तू क्यों उदास है





Thursday, 31 July 2014

मोहब्बत की इन्तिहाँ तक जाऊंगा

मैं तो मोहब्बत की इन्तिहाँ तक जाऊंगा
तेरे जिस्म से लेकर तेरी जाँ तक जाऊंगा

मेरे दिल में मिलन-ए-नज़र-ए-चिराग जल चुका है
तेरे इंतज़ार में ज़ीस्त के अंतिम ख़िज़ाँ तक जाऊंगा

ये मोहब्बत! है इसमें बे-सबब रुस्वाई तो होती ही है
तुझको पाने मैं तेरे अंतिम नक्श-ए-पाँ तक जाऊंगा

बिन तेरे मेरी ज़िंदगी बस एक तन्हाई की रात है "धरम"
रौशन-ए-ज़ीस्त के लिए हद-ए-सितम-ए-दौराँ तक जाऊंगा 

Tuesday, 15 July 2014

लब पे ताला पड़ गया

ज़रा सी बात थी मगर रंग गहरा पड़ गया
दिल टूटा ही था की ज़ख्म गहरा पड़ गया

अब तो कोई राज़ दफ़न भी नहीं है सीने में
दिल में झांक कर देखा जिस्म ठंढा पड़ गया

हसरत भरी निगाह भी अब काम नहीं आती
जो उतरा दरिया-ए-इश्क़ में तो सूखा पड़ गया

जब से मेरी ज़िंदगी का आफताब बे-वक़्त डूबा है
चौदवीं के महताब का भी रंग काला पड़ गया

इस शहर में अब तो हर कोई मुझसे खफ़ा है "धरम"
जो पूछा हाल-ए-दिल तो लब पे ताला पड़ गया 

Sunday, 6 July 2014

अब नहीं मिलता

दूर तलक अब कोई बूढ़ा सज़र नहीं मिलता
राह-ए-ज़िंदगी में कोई हमसफ़र नहीं मिलता

हम तो खड़े हैं कई सालों से चौहरे पर मगर
मुझे अपनी तबीयत का कोई डगर नहीं मिलता

पेश-ए-नज़र भी किये औरों का नज़राना भी लिया
मिले जो दिल को सुकूँ ऐसा कोई नज़र नहीं मिलता

मर्ज़-ए-इश्क़ में तो हरेक दवा नाकाम होती है "धरम"
कर दे जो तबीयत हरी ऐसा कोई ज़हर नहीं मिलता 

Saturday, 5 July 2014

चंद शेर

1.
दो दिलों का फ़ासला कुछ यूँ बढ़ता गया
गोया बुढ़ापे का रंग जवानी पर चढ़ता गया

2.
ज़ूनू-ए-इश्क़ में गर्क-ए-दरिया का सफर अभी बाकी है
एक रोज मुझको डूबना है मगर वो मंज़र अभी बाकी है

Wednesday, 18 June 2014

रस्म जांनिसारी का

जुड़ने से पहले ही टूट गया वो रिश्ता यारी का
अब कहाँ किसके पास है इलाज़ इस बीमारी का

ज़माने से अब रश्म उठ चुका है ऐतबारी का
हर ओर व्याप्त है प्रभाव इस महामारी का

होठों पे रखते हैं ख़ुशी औ" दिल में ज़रर
अब तो हर ओर चलन है इसी अदाकारी का

मोहब्बत तो हो गया एक जरिया जांआज़ारी का
अब कहीं नहीं मिलता "धरम" रस्म जांनिसारी का

Friday, 13 June 2014

कोई आशियाँ न मिला

रात भर जुगनू रौशनी लुटाता रहा
मेरे दर्द-ए-दिल को यूँ हीं बढ़ता रहा

मैं ढूंढता रहा सुकूँ देने वाली अँधेरी रात
कहीं चिराग तो कहीं जलता दिल मिलता रहा

ज़ख्म पर नमक तो मिला मरहम न मिला
जो समझ सके दर्द-ए-दिल वो हमदम न मिला

चेहरे की मायूसी भी भला कहाँ छुपती है
मुझे तो किसी मकाँ में कोई घर न मिला

दिल टूटा हुआ था अब तो जिस्म भी तड़पने लगा
ढूंढने पर भी किसी शहर में कोई इन्सां न मिला

थककर जब मैं खुद अपने शहर को लौटा "धरम"
वहां भी मुझे अपना वो पुराना आशियाँ न मिला  

Thursday, 12 June 2014

काल

मुहं फाड़े काल
सुनामी के मानिंद
बढ़ता चला आ रहा
तोड़ता चबाता निगलता हरे भरे वृक्ष

मानव खुद अर्पण कर रहा
अपना जीवनदायनी रक्षा कवच
काल का पेट समंदर से भी गहरा
निगलकर वृक्ष करता चोट मानव पर

न करता कभी उल्टी
न होता कभी कब्ज़ काल को
हर वक़्त भूखा प्यासा
कहर बरपाने की आशा

उजाड़ कर जंगल बस्ती
हँसता खिलखिलाता झूमता
और करता तांडव नृत्य
शेष मानव थरथराता देखकर यह कृत्य

प्रकृति का यह रौद्र रूप
कितना भयानक कितना कुरूप
मानो फन काढ़े विषैले असंख्य सर्प
उगल रहा हलाहल

प्रकृति से खिलवाड़ कितना भयंकर
मानो तीसरा नेत्र खोले साक्षात शंकर
उगल रहा अपने गले का विष नीलकंठ
मचा रहा कोहराम औरों का सूखता कंठ

सबल मानव
कितना दुर्बल दीखता अपने कुकृत्य पर
पछताता अहा! न खेलता प्रकृति से
और एक बार फिर काटता जंगल

बनाता कारखाना बहाता मल
गंगा का जल अब कहाँ स्वच्छ कहाँ निर्मल
पीकर प्रदूषित जल
करता रोग की खेती स्वयं अपने अन्दर

राक्षश कब अपने कु-कृत्य पर पछताता है
कर औरों पर ज़ुल्म वह खूब खिलखिलाता है
सब से सबल धरा पर वह अपने को बतलाता है
मगर आह! यह काल उसको भी खा जाता है

गिद्धों का हर ओर हो रहा महाभोज
अँधा मानव निकालना चाहता कारण इसका खोज
जो कारण है स्पष्ट वह उसको दीखता नहीं
बिगड़ता देख प्रकृति का संतुलन वह कुछ सीखता नहीं



Thursday, 5 June 2014

रिश्ता

मेरे रिश्ते को धागों से मत बांधो
खुला रहने दो सैर करने दो आसमाँ में
झुक कर चूम लेने दो ज़मीं को
घुलकर बहने दो नदी में कहीं संगम हो जाए

बहने दो इसे हवा के साथ स्वछन्द
कस कर खींचो स्वांस कहीं क्षणिक मिलन हो जाए
और कर पाये महसूस तुम्हारी धड़कन को
स्वांस का आना-जाना तो यूँ हीं लगा रहता है

ग़र तुम पलटो वरक मेरे दिल का
मिलेंगे आड़ी-तिरछी रेखाएं तेरे हथेली की
और उसके साथ मिलेगा कुछ महफ़ूज़ यादें
जिसे वक़्त ने धुंधला कर दिया है