Wednesday, 24 July 2019

यूँ ही मालिक का सर नहीं झुकता

ख़्वाब कैसा भी हो उसे भर नज़र देखना जरुरी होता है
ये हम कैसे कह दें कि इश्क़ का हर रंग सिंदूरी होता है

ये सारे सामईन को कद्रदान समझूँ या फिर ग़ुलाम तेरा
तेरी महफ़िल में हर किसी का जवाब जी हुज़ूरी होता है

कैसे कह दें कि ये बोझ अब तो कभी न उठाया जाएगा
यहाँ अपनी लाश अपने कंधे पर ढ़ोना रोजगारी होता है

एक ज़िस्म दो रूहों को अपने अंदर कब उतार लेता है 
जब दोनों रूहों  का दोनों जिस्मों  पर सरदारी  होता है

ग़ुलाम के क़दमों में यूँ ही मालिक का सर नहीं झुकता 
दोनों एक अलग ही  दर्ज़े का "धरम" व्यापारी  होता है

Wednesday, 10 July 2019

दर्द

दर्द किसी पेड़ का कोई एक फल नहीं होता
वह तो पूरा का पूरा दरख़्त होता है
जिसकी जड़ें किसी भी सीने की गहराई से
ज़्यादा गहरी होती है
दर्द को सीने में समेटना
इसीलिए मुमकिन नहीं होता

दर्द महज़ एक एहसास नहीं होता 
वह तो कई एहसास से मिलकर बनता है
जो सीने के परत-दर-परत को चीरते हुए
सीने से बाहर निकल जाता है
बाद इसके बाक़ी सारे एहसास
बिना किसी रुकावट के
सीने के आर-पार होते रहते हैं

दर्द कभी भी सीने के किनारे से नहीं गुजरता
वह समान रूप से सीने में फैलता 
हर एहसास को
छूता-टटोलता जिलाता-मारता निकल जाता है 
अपने पीछे प्रश्न छोड़कर
कि दर्द पैदा होता है बढ़ता है
मगर बूढ़ा क्यूँ नहीं होता मरता क्यूँ नहीं ?

Wednesday, 3 July 2019

चंद शेर

1.
क्यूँ किनारा नहीं लगती ज़िंदगी  क्यूँ कोई ख़्वाब उभरकर नहीं आता
बहार के मौसम में भी "धरम" क्यूँ कोई हिज़्र भी उभरकर नहीं आता

2.
अपने पाँव तले अपनी ज़मीं कब थी "धरम" अपने सर के ऊपर अपना आसमाँ कब था
अपनी ज़िंदगी कितने ही कब्र से होकर गुजरी मगर उसमें कोई भी अपना जहाँ कब था

3.
ज़िंदगी इस शक्ल से गुज़री "धरम" कि हर हद तक नासाज़ रही
लिखने के लिए न हाथ रहा बोलने के लिए न मुँह में आवाज़ रही

Sunday, 16 June 2019

दिल मरोड़ना पड़ता है

हर बार ख़त मोहब्बत का लिखने से पहले कलम तोड़ना पड़ता है
दिल में कोई भी आरजू पैदा करने के लिए दिल मरोड़ना पड़ता है

कोई इश्क़ कब तक ज़िन्दा रहता है इसका कुछ भी अंदाज़ा नहीं 
मगर हाँ! ज़िन्दा इश्क़  को देखने के लिए  आँख फोड़ना पड़ता है 

कोई एक तहज़ीब दूसरे किसी तहज़ीब से यूँ ही नहीं जुड़ जाता है
कि दोनों के मिट्टी से मिट्टी औ" पानी से पानी को जोड़ना पड़ता है 

ऐ हुस्न-ए-बेपरवाह तुझसे बचकर  निकलना कुछ आसान तो नहीं 
लिए इसके हर दिल को हर बार  ख़ुद-ब-ख़ुद  सिकुड़ना पड़ता है

फ़ैसला ख़ुद अपने ही दिल का  ख़ुद को भी  यूँ ही मंज़ूर नहीं होता 
कि ख़ुद ही से ख़ुद को "धरम" कई बार तन्हाई में लड़ना पड़ता है 

Monday, 3 June 2019

चंद शेर

1.
अब तो थक चुका हूँ "धरम" बुरा सुनते सुनते भला कहते कहते
अब तो कुछ भी असर नहीं होता इस तरह ज़माने में रहते रहते

2.
नग़मा अब कोई ज़ुबाँ पर आता नहीं किसी भी ज़ख्म पर अब दिल दुखाता नहीं
मौत से पहले मौत की बात "धरम" अब तो ग़ुबार उड़ाता नहीं दिल जलाता नहीं

3.
बाहर तन्हा चारदीवारी अंदर हिज़्र में लिपटे एक-एक जज़्बात
क्या कहें अब तो "धरम" ख़ुद से भी ख़ुद की होती नहीं है बात  

Saturday, 1 June 2019

हर ओर ज़िस्म लहराता रहा

जो छलक कर जाम प्याले से ज़मीं पर गिरा तो वो सूखता रहा
कितने सारे हलक़ प्यासे थे मगर हर हलक़ सिर्फ तरसता रहा

ज़िंदगी रेत की  तरह थी  मुट्ठी से हर वक़्त  बस  सरकती रही
ज़मीं पर गिरी  धूल में मिली  वह  सिर्फ भर नज़र  देखता रहा

वो  इश्क़ मोहब्बत उल्फ़त  सब का  बज़्म में  एक ही रंग रहा
वो सब  बस कदम ही चूमती रही हर ओर ज़िस्म लहराता रहा

रूह को जब शक्ल मिली  तो आईने ने उसको भी नकार दिया
ज़िस्म से निकलकर  रूह जाता रहा  ज़िस्म  बस पुकारता रहा

हुनर पर यकीं था  तो ज़माने से  न जाने क्यूँ  उम्मीद  लगा बैठे
उम्मीद के तराजू पर हर हुनर "धरम" बस उम्र भर झूलता रहा 

Tuesday, 7 May 2019

अब तक न हुआ

कि जब तक  शबाब-ए-हुस्न था  ज़िक्र-ए-इश्क़  तब तक न हुआ
एक आग  सुलगती  रही बदन में रूह  शादाब अब तक न हुआ

जब यार पर  ऐतबार न  किया मज़ार-ए-यार पर सज़दा न किया
ज़माने में  हद-ए-निगाह  तक  कोई भी  अपना अब तक न हुआ

दरम्यां दोनों  रूहों के न  सिर्फ दीवार उठाई  गई  बुलंद भी हुई
बाद दीवार  गिरा  दी गई  मगर हर्ष-ए-विसाल  अब तक न हुआ

हर जंग-ए-ज़िंदगी में न सिर्फ  शिकस्त खाई मिट्टीपलीत भी हुआ
मौत तो क्या  ज़िंदगी के साथ  चलने का साहस अब तक न हुआ

ज़िंदगी के हर आग से आग के रिश्ते को 'धरम' पानी करता रहा 
हाँ मगर उस रिश्ते के पानी को छूने का साहस अब तक न हुआ

Tuesday, 30 April 2019

चंद शेर

1.
न कुछ मैंने पूछा न कुछ उसने कहा औ" दरम्यान दोनों के सन्नाटा चीखता रहा
बात न तो नज़र से बयां हुई न ही ज़ुबाँ से 'धरम' वो वक़्त मुसलसल काटता रहा

2.
मुलाक़ात के हर रश्म को मैंने अंतिम संस्कार के तरह अदा किया
कि बाद उसके मैंने उससे 'धरम' फिर कभी नहीं कोई वादा किया

3.
इसी से ज़ख्म का 'धरम' अंदाज़ा लगा कि हर मरहम उस ज़ख्म पर सादा लगा
ढूंढती रही ज़िंदगी ख़ुद को मिट्टी में ज़मीं से उठने का फिर न कोई इरादा लगा

4.
मैंने तो दम तोड़ ही दिया है  "धरम" मगर जज्बा में दम अब भी बाकी है
मंज़िल पर पहुंचने के बाद भी लगता है की  कुछ और भी कदम बाकी है

5.
पहले इश्क़ हुस्न से शर्मिंदा था अब हुस्न इश्क़ से शर्मिंदा है
"धरम" तो पहले दीवाना था मगर अब क्या कहें वो रिंदा है

6.
हर बार मेरा ही चिराग-ए-लौ "धरम" हवा के ज़द में था
तूफाँ जब भी आया  मेरा घर हर  बार उसके  हद में था

7.
ये नासाज़ी ऐसी है कि  हर दुआ बे-असर है  औ" है हर दवा नाकाम
भूत इश्क़ का जब न तो चढ़े न उतरे "धरम" तो यही होता है अंज़ाम 

Tuesday, 23 April 2019

रास्ता ख़ुद ही मुड़ जाता है

वक़्त हर  रोज  क्यूँ  रात  की दहलीज़ पर छोड़  जाता है
सुबह होने  से पहले  ही  वो मुझसे  रिश्ता तोड़  जाता है

कि हर शाग़िर्द मुझसे मिलकर  मुझे ही  तन्हा  करता है
वो हर रोज़  हिज़्र की  दीवार में  एक ईंट  जोड़  जाता है

जब चला था तो मैं  मेरी किस्मत औ" रहबर सब साथ थे 
क्यूँ मंज़िल क़रीब आते ही रास्ता ख़ुद ही  मुड़   जाता है

जब पास मेरे मसीहा औ" क़ातिल एक ही शक्ल में आए
तो मौत औ" जीवन दोनों "धरम" मुझसे बिछड़ जाता है

Thursday, 4 April 2019

चंद शेर

1.
जाने किस उम्मीद से  "धरम"  वो ख्वाईश फिर जगी
कि मेरे हलक़ में क्यूँ बुझी हुई पुरानी आग फिर लगी

2.
समंदर ने तो ता-उम्र प्यासा रखा प्यास अपने ही बदन के पानी ने बुझाई
अंत में  ख़ुद अपने ज़िस्म में "धरम" ख़ुद अपनी ही साँसों ने आग लगाई

3.
न ही कहीं कोई नज़र प्यासी है  न ही तस्सबुर में कोई चेहरा उभरता है 
कि सीने में न ही कोई साँस बाक़ी है 'धरम' न ही कभी दिल धड़कता है