Sunday, 28 January 2024

कभी आतिश-ए-'इश्क़-ए-बला हो न सका

अपने वुजूद का कोई मुकम्मल फ़ैसला हो न सका 
बेचैनी ऐसी थी कि इश्क़ कभी मश्ग़ला हो न सका

नज़ारा हर ख़्वाब के क़त्ल का नज़रों में घूमता रहा 
ज़ेहन में कभी आतिश-ए-'इश्क़-ए-बला हो न सका 

सितम को शबाब हासिल था  गर्दन बस झुकी रही   
औ" ज़ुबान से कभी भी  कोई क़ल्क़ला हो न सका

मुसलसल ख़्वाब ख़याल नज़र सिर्फ़ जलजला रहा  
किसी और फ़र्ज़ के लिए सीने में ख़ला हो न सका

संग को तराशना रूह देना सीने में महफ़ूज़ रखना 
ऐसा वाक़ि'आ है कि इससे कभी भला हो न सका

तिजारत के सारे इल्म-ओ-फ़न बस नाकाम ही रहे 
मोहब्बत कभी "धरम" ख़ुश-मु'आमला हो न सका  


 

मश्ग़ला : शौक़
क़ल्क़ला : बोलना
जलजला : कष्टदायक
ख़ला : ख़ाली जगह
ख़ुश-मु'आमला : लेन देन में अच्छा 

Monday, 15 January 2024

रिश्ते की रा'नाई गई

ये कैसी तपन थी जिसे आग ही से बुझाई गई  
किसकी वफ़ा थी जो सर-ए-'आम लुटाई गई

ज़िंदगी महज कोई नाटक खेल तमाशा जैसा   
बस एक पर्दा गिरा कि पूरी जल्वा-नुमाई गई
 
कि हाल-ए-दिल बयाँ करे भी तो किससे करे
मुलाक़ात जैसी भी हो हमेशा दिलरुबाई गई 
    
रिश्ता ख़ामोशी का था लफ़्ज़ बस इशारा था  
जब भी कोई गुफ़्तगू हुई मानो पा-बजाई गई
 
वो किसका रास्ता था वो किसकी मंज़िल थी 
फ़तह होते ही उस मंज़िल की आशनाई गई
  
ख़ुशी ने तबीयत से जब भी कोई रिश्ता बुना  
चंद कदम में ही 'धरम' रिश्ते की रा'नाई गई
   
 ----------------------------------------------------
जल्वा-नुमाई : अपने-आप को दिखाना
दिलरुबाई : माशूक़ाना अंदाज़
पा-बजाई : भरपाई
आशनाई : परिचय
रा'नाई : सुंदरता, सौंदर्य

Monday, 1 January 2024

चाँदनी फिर मचल जाएगी

पता न था बज़्म में बात ऐसी भी चल जाएगी  
मायूसी  किसके दर पर पहले-पहल जाएगी
 
ख़ुशी का दामन अब और कितना थामना है 
थोड़ी देर और ठहर की शक्ल बदल जाएगी 

उन्हें गुमाँ है की बुलंदी उनके क़दमों तले है  
यकीं मान वो ज़मीं क़दमों से निकल जाएगी
 
जो रात आज आई है कल फिर वही आएगी
एक ख़बर थी कि चाँदनी फिर मचल जाएगी 

जो वादा था की अब ये मुलाक़ात आख़िरी है 
किसे ख़बर थी कि वो बात फिर टल जाएगी 

दो नज़रों का चिराग़ था रौशनी शबाब पर थी 
यक़ीं न था वो कि बुझने से पहले ढल जाएगी

दुआ की कुछ बात मुँह से निकल गई 'धरम' 
ये ख़याल न था की ज़ुबाँ ऐसे फिसल जाएगी     

Tuesday, 26 December 2023

लफ़्ज़ कभी बे-लिबास न हुआ

तबी'अत आबरू में रही  चेहरा भी उदास न हुआ
तल्ख़ियाँ के दौर में लफ़्ज़ कभी बे-लिबास न हुआ

क़ब्र सीने में था मगर जब्र से महफ़ूज़ न रख सका    
दिल में छुपाया था  मगर पुख़्ता इहतिरास न हुआ
 
महज़ वक़्त का तक़ाज़ा था  एक रिश्ता पैदा हुआ  
उम्र भर साथ रहे मगर कभी रम्ज़-शनास न हुआ

उम्र को ता-उम्र तराशना  हमेशा आईना दिखाना  
बाद इस इल्म के भी कभी ज़माना-शनास न हुआ

कि हुस्न जब ढ़लान पर पहुँचा तो अंजुमन में कोई 
इश्क़ की बात न चली मख़्बूत-उल-हवास न हुआ 

कि न तो कोई ख़ौफ़-ए-ख़ुदा न ही कोई दीन-दारी
कभी ख़ुद की नज़र का भी "धरम" हिरास न हुआ

-----------------------------------------------------

इहतिरास: सुरक्षा
रम्ज़-शनास: इशारा समझने वाला 
बद-हवास: तंग 
ज़माना-शनास: समय के अनुकूल काम करनेवाला
मख़्बूत-उल-हवास: जिसके होश-ओ-हवास जाते रहे हों, दीवाना
दीन-दारी: धार्मिकता
हिरास: डर, ख़ौफ़

Wednesday, 22 November 2023

हर रंग छुड़ाता रहा

कभी तन्हाई जलाती रही कभी शोर सताता रहा 
कि मंज़र कोई भी हो  दिल हमेशा  दुखाता रहा
   
वो धुआँ कहाँ से उठा  क्यूँ उठा  कुछ पता नहीं
मगर हाँ धुआँ में तैरता  कोई चेहरा छुपाता रहा 

वो बर्क़ न थी हिज़्र के  आबरू एक कहानी थी
राख ज़मीं से उड़ा औ" आसमाँ में समाता रहा

नींद का न आना हरेक ख़्वाब का क़त्ल ही था
फिर मुर्दा आँखें बंद कर ख़ुद को सुलाता रहा

नसीब में था  एक हथेली आसमाँ  चंद सितारे   
फिर वो त'अल्लुक़ उम्र-भर क़र्ज़ चुकाता रहा

हाथों पर चेहरे का हर रंग उभरता रहा "धरम" 
फिर बड़े इल्म-ओ-फ़न से हर रंग छुड़ाता रहा 

Saturday, 11 November 2023

चेहरा बद-हवास लिए

वो जहाँ में घूमता है ये कैसी वफ़ा की प्यास लिए 
हर शख़्स खड़ा है  चेहरे पर  सादा क़िर्तास लिए
 
न तो कहीं ज़मीं अपनी   न ही कोई 'अर्श अपना
कहाँ निकले किधर जाए  वह चेहरा उदास लिए 

है साफ़ आसमाँ औ" कहीं धूप भी कहीं छाँह भी 
जैसे  निकला हो ख़ुर्शीद   चेहरा बद-हवास लिए

अब अब्र भी बरसे तो लगे कि कोई आग हो जैसे
कि हर रोज़ चिढ़ाती है ज़िंदगी यही एहसास लिए

जब आँखें बंद हुई  तब  कोई ख़्वाब सँवरने लगा 
लगा की कोई बुला रहा हो चेहरा ना-शनास लिए 

हद-ए-नज़र तक "धरम" फैली ये कैसी फ़िज़ा है 
क़तरा दरिया समंदर  सब खड़े है इलफ़ास लिए   
   
 


क़िर्तास: काग़ज़
'अर्श: आकाश, आसमान 
ख़ुर्शीद: सूरज 
बद-हवास: तंग 
अब्र: बादल 
ना-शनास: अजनबी 
इलफ़ास: दरिद्रता, ग़रीबी  

Wednesday, 8 November 2023

दिख रहा सीने के आज़ार भी

कुछ रास्ते की ढलान थी  कुछ था तिरा रफ़्तार भी
उस सफ़र में मुसलसल बदलता रहा किरदार भी 

हरेक पैमाना कह रहा  यहाँ अब  कोई वफ़ा नहीं 
इस बज़्म में बैठे हैं  कई बेवफ़ाई के ख़तावार भी 

यूँ तो मौत की पनाह में कभी शक्ल मुरझाई नहीं         
मगर अब चेहरे पर दिख रहा सीने के आज़ार भी 

पहले दिल को लगा की धड़कन ख़ून-बार हो जैसे        
फिर कलेजे को खलने लगा साँसों के अज़हार भी 
   
एक चेहरा नूरानी था ख़ुर्शीद पेशानी पर रौशन था
साथ इसके मौज़ूद था वहाँ  महताब फुज़ूँ-कार भी

तिरा होना जैसे पलकों का  आँखों से रिश्ता बुनना 
क्या की "धरम" छुप के भी रहना औ" नुमूदार भी  



------------------------------------
ख़तावार : जिसपर अपराध सिद्ध हो चुका हो 
ख़ून-बार: ख़ून बरसाने वाला
अज़हार: दीपक जलाना, चिराग़ रौशन करना
फुज़ूँ-कार: उन्नति देने वाला, बढ़ाने वाला, प्रोत्साहक  
नुमूदार: सामने आना

Wednesday, 11 October 2023

मगर सालिमन नहीं

तेरी महफ़िल में अब वो 'इल्म-ओ-फ़न नहीं 
नुमाइश-ए-फूल तो है मगर कोई चमन नहीं 

जो मिलाया हाथ तो ताल्लुक़ थम सा गया है 
है तो इश्क़ दोनों तरफ मगर सालिमन नहीं 

कि ज़मीं भी लिपट गई  'अर्श भी समा गया     
उसके तौर-ए-इश्क़ हैं कोई सेहर-फ़न नहीं 

जिसकी कमी से वो शाम एक सुब्ह सी हुई
एक झुलसी हुई नज़र है कोई चितवन नहीं   

उन शर्तों पर मौत तो आसाँ थी ज़िंदगी नहीं 
हर रोज़ ये वाक़ि'आ है कोई साबिक़न नहीं 

आँखों से आँखें यूँ मिली वक़्त भी ठहर गया 
वो दिलकश तो लगा  मगर तबी'अतन नहीं 

अब "धरम" को इस दुनियाँ में खोजना नहीं 
मिले तो एक फ़रेब है कोई हक़ीक़तन नहीं 

--------------------------------------------------
'इल्म-ओ-फ़न: ज्ञान और कला  
चमन: फूलों का बगीचा 
सालिमन: पूरे तौर पर, पूर्णतया
सेहर-फ़न: जादूगरी/तांत्रिक
चितवन: किसी की ओर प्रेमपूर्वक या स्नेहपूर्वक देखने की अवस्था
साबिक़न: पहली दफ़ा
तबी'अतन: मन से
हक़ीक़तन: वातस्व में
 

Tuesday, 26 September 2023

बज़्म बे-नूर नहीं था

दिल से निकला तो था  मगर दूर नहीं था
अलग रहता तो था मगर महजूर नहीं था

बुनियाद इश्क़ की अश्क पर टिकी रही 
अश्क बहता तो था मगर मौफ़ूर नहीं था
 
कुछ भी ख़याल नहीं कि आँखें क्यूँ झुकीं
ये कि दोनों अब  साबिक़-दस्तूर नहीं था

या तो जज़्बात या जुनूँ या अश्क या लहू 
कुछ तो जलता रहा बज़्म बे-नूर नहीं था

ख़्वाब का दरिया औ" ख़याल की कश्ती   
उस सफ़र में कौन था  जो रंजूर नहीं था 

मसअला-ए-दिल है  बस हूँक उठती रहे    
"धरम" ये मुआमला किसे मंज़ूर नहीं था
 

---------------------------------------------
महजूर: बिछड़ा हुआ
मौफ़ूर: असीमित
साबिक़-दस्तूर: पहले की तरह
बे-नूर: प्रकाश रहित
रंजूर: ग़मगीन
 

Saturday, 9 September 2023

कोई बाग़बाँ नहीं दीखता

सितारों के पहले भी  कोई जहाँ नहीं दीखता 
किसी से भी मिलूँ  ये दिल  जवाँ नहीं दीखता
 
ज़ेहन में यूँ आग लगी सहरा भी राख हो गया
दिल में दर्द का अब कोई निशाँ नहीं दीखता

वादों की जो बात चली हर नज़र झुकने लगी
सितम का एक इल्म है  ये कहाँ नहीं दीखता 

इश्क़ दरिया से था मगर हासिल क़तरा हुआ      
अब रिश्ते में कोई ताब-ओ-तवाँ नहीं दीखता 

वो लहू से पैदा हुआ उसे अश्क़ बहा ले गया
कि आँखों में कोई राज़-ए-निहाँ नहीं दीखता

कैसा जश्न-ए-उल्फ़त है  हर चेहरा मायूस है 
बाग़ तो है "धरम" कोई बाग़बाँ नहीं दीखता 



---------------------------------------------------------- 
ताब-ओ-तवाँ: शक्ति, जोर, बल, क़ुव्वत, ताक़त
राज़-ए-निहाँ: वो राज़ जो ज़ाहिर न हुआ हो