Tuesday, 7 May 2019

अब तक न हुआ

कि जब तक  शबाब-ए-हुस्न था  ज़िक्र-ए-इश्क़  तब तक न हुआ
एक आग  सुलगती  रही बदन में रूह  शादाब अब तक न हुआ

जब यार पर  ऐतबार न  किया मज़ार-ए-यार पर सज़दा न किया
ज़माने में  हद-ए-निगाह  तक  कोई भी  अपना अब तक न हुआ

दरम्यां दोनों  रूहों के न  सिर्फ दीवार उठाई  गई  बुलंद भी हुई
बाद दीवार  गिरा  दी गई  मगर हर्ष-ए-विसाल  अब तक न हुआ

हर जंग-ए-ज़िंदगी में न सिर्फ  शिकस्त खाई मिट्टीपलीत भी हुआ
मौत तो क्या  ज़िंदगी के साथ  चलने का साहस अब तक न हुआ

ज़िंदगी के हर आग से आग के रिश्ते को 'धरम' पानी करता रहा 
हाँ मगर उस रिश्ते के पानी को छूने का साहस अब तक न हुआ

Tuesday, 30 April 2019

चंद शेर

1.
न कुछ मैंने पूछा न कुछ उसने कहा औ" दरम्यान दोनों के सन्नाटा चीखता रहा
बात न तो नज़र से बयां हुई न ही ज़ुबाँ से 'धरम' वो वक़्त मुसलसल काटता रहा

2.
मुलाक़ात के हर रश्म को मैंने अंतिम संस्कार के तरह अदा किया
कि बाद उसके मैंने उससे 'धरम' फिर कभी नहीं कोई वादा किया

3.
इसी से ज़ख्म का 'धरम' अंदाज़ा लगा कि हर मरहम उस ज़ख्म पर सादा लगा
ढूंढती रही ज़िंदगी ख़ुद को मिट्टी में ज़मीं से उठने का फिर न कोई इरादा लगा

4.
मैंने तो दम तोड़ ही दिया है  "धरम" मगर जज्बा में दम अब भी बाकी है
मंज़िल पर पहुंचने के बाद भी लगता है की  कुछ और भी कदम बाकी है

5.
पहले इश्क़ हुस्न से शर्मिंदा था अब हुस्न इश्क़ से शर्मिंदा है
"धरम" तो पहले दीवाना था मगर अब क्या कहें वो रिंदा है

6.
हर बार मेरा ही चिराग-ए-लौ "धरम" हवा के ज़द में था
तूफाँ जब भी आया  मेरा घर हर  बार उसके  हद में था

7.
ये नासाज़ी ऐसी है कि  हर दुआ बे-असर है  औ" है हर दवा नाकाम
भूत इश्क़ का जब न तो चढ़े न उतरे "धरम" तो यही होता है अंज़ाम 

Tuesday, 23 April 2019

रास्ता ख़ुद ही मुड़ जाता है

वक़्त हर  रोज  क्यूँ  रात  की दहलीज़ पर छोड़  जाता है
सुबह होने  से पहले  ही  वो मुझसे  रिश्ता तोड़  जाता है

कि हर शाग़िर्द मुझसे मिलकर  मुझे ही  तन्हा  करता है
वो हर रोज़  हिज़्र की  दीवार में  एक ईंट  जोड़  जाता है

जब चला था तो मैं  मेरी किस्मत औ" रहबर सब साथ थे 
क्यूँ मंज़िल क़रीब आते ही रास्ता ख़ुद ही  मुड़   जाता है

जब पास मेरे मसीहा औ" क़ातिल एक ही शक्ल में आए
तो मौत औ" जीवन दोनों "धरम" मुझसे बिछड़ जाता है

Thursday, 4 April 2019

चंद शेर

1.
जाने किस उम्मीद से  "धरम"  वो ख्वाईश फिर जगी
कि मेरे हलक़ में क्यूँ बुझी हुई पुरानी आग फिर लगी

2.
समंदर ने तो ता-उम्र प्यासा रखा प्यास अपने ही बदन के पानी ने बुझाई
अंत में  ख़ुद अपने ज़िस्म में "धरम" ख़ुद अपनी ही साँसों ने आग लगाई

3.
न ही कहीं कोई नज़र प्यासी है  न ही तस्सबुर में कोई चेहरा उभरता है 
कि सीने में न ही कोई साँस बाक़ी है 'धरम' न ही कभी दिल धड़कता है  

Saturday, 30 March 2019

कभी ऐसे तो न चाहा तुमको

कभी ऐसे तो  न चाहा तुमको कि  तेरे जाने का  कोई मलाल होता
जब कोई अरमाँ  थी ही नहीं तो  ऐसा कुछ  न था जो  हलाल होता

हमारे ज़िस्म साथ  तो बसर करते मगर  रूह दोनों के अलग रहते
दरम्यां दोनों  अलग-अलग  रूह में  कहाँ कुछ था जो सवाल होता

यूँ तो बस  मन रखने को  हम दोनों ने  कह दिया था रिश्ता उसको 
रिश्ते को  ज़िस्म रूह  कुछ हासिल  न था तो कैसे वो पामाल होता 

साथ रहते दो  ज़िस्म जिसे  ख़ुद  अपनी-अपनी रूहों का पता नहीं
बिना जज़्बात  के ग़र वो दो ज़िस्म  मिलते भी तो क्या विसाल होता

अपनी-अपनी धुन में रहने वाले दो  ज़िस्मों के  अपने-अपने सवाल
ग़र किसी अनसुने सवाल का जवाब होता भी तो क्या कमाल होता

बिना किसी सवाल  के ग़र जवाब ढूंढती  ज़िंदगी भी तो क्या ढूंढती
उस बिना किसी सवाल वाले इम्तिहाँ का "धरम" क्या मआल होता  

Monday, 4 March 2019

चंद शेर

1.
जो कुछ भी मैंने लिखा "धरम" वो  लिखने का मुझे कोई हक़ न था
किताब मुक़म्मल तो हो गई थी मगर हाँ उसमें एक भी वरक़ न था

2.
मेरे कदमों का रिश्ता "धरम" न तो ज़मीं से था  न ही मंज़िल से था
ज़िंदगी तमाम उम्र मझधार में रही कहाँ कभी रिश्ता साहिल से था

3.
कि अब तो कोई भी दर्द "धरम" हद से गुज़रता नहीं है
बदन पर ज़ख्म का निशाँ भी बदन पर उभरता नहीं है

4.
कोई रंग जीवन में कब था "धरम"  जब हर कहानी बेरंग रही
कि सांस हर रात बुझता था जलकर औ" जवानी पूरी तंग रही

5.
कागज़ पर उपजे रिश्ते को "धरम" दिल में उतरने में एक उम्र लग जाती है
मैंने अक्सर देखा है दिल में उतरने के पहले ही कोई चिंगारी सुलग जाती है

6.
मेरे क़त्ल के ज़ुर्म का भी "धरम" मुझ ही से हिसाब मांगते हैं
ये कैसे लोग हैं  जो अपने किए हर ज़ुर्म पर  नक़ाब मांगते हैं 

7.
कब मेरा रूह 'धरम' मेरे ज़िस्म में था  कब मेरी साँसें मेरे सीने में थीं
कब मेरा लहू मेरी शिराओं में था औ" कब मेरी नज़र मेरी आँखों थीं 
 

Tuesday, 22 January 2019

चंद शेर

1.
वो जो मौत की नींद सो गई थी 'धरम' वो चाह फिर से क्यूँ जगी
जब ज़िस्म पूरा का पूरा ठंढा था तो फिर दिल में आग क्यूँ लगी

2.
हम साथ तो निकले थे 'धरम' पर मैं कहाँ तक चला तुम कहाँ तक चली
अपनी साँस रूह ज़िस्म नज़र इनमें कुछ भी तो कभी एक साथ न चली

3.
कि बाद उस क़रार के महज़ उसका ख़्याल भी चुभने लगा
दिल के साथ न जाने क्यूँ "धरम" पूरा ज़िस्म भी दुखने लगा

4.
जलती आखों में  हर मंज़र बस  राख बनकर रह गया
वो इश्क़ भी "धरम" महज़ एक ख़ाक बनकर रह गया

5.
एक ही मौत काफी नहीं होती 'धरम' इश्क़ को मुकम्मल होने में
मुझे तो कई बार  यूँ ही मरना पड़ता है  महज़ एक ग़ज़ल होने में 

Saturday, 12 January 2019

उजाला छा न सका

नज़र से पिया  हलक़ में उतारा  मगर दिल  में बसा न सका
रिश्ते के  रूह को उसके ज़िस्म से  कभी अलग पा न सका

वो नाम  जब भी  ज़ुबाँ पर आए  तो आह! क्या तरन्नुम आए  
ज़ुबाँ तो खुले  मगर उसे  कभी गुनगुना न सका  गा न सका

मौसम बहार  का खिज़ा का  इश्क़ का  या फिर तन्हाई का
इनमें कोई भी  मौसम मेरे  दहलीज़ तक  कभी आ न सका 

ख़ुर्शीद चिराग़ जुगनू हर किसी के  रौशनी  की नुमाईश हुई
बाबजूद इसके "धरम" कभी मेरे घर में उजाला छा न सका

Saturday, 5 January 2019

चंद शेर

1.
कि हर किसी को  मुक़ाम हासिल हो  हर ख़ामोशी को ज़ुबान हासिल हो 
अब वहाँ चलो "धरम" जहाँ हर दर्द को अपनी अलग पहचान हासिल हो

2.
वादों से ऊब के अब जां निकले  हम तो ख़ुद  अपने ही घर में मेहमाँ निकले
जब भी मंज़िल की ओर निकले "धरम" तो पता नहीं फिर कहाँ-कहाँ निकले

3.
अल्फाज़ मोहब्बत के कब के बदल गए अब तो दिल भी दुखाने लगे
मिले जो नज़र से नज़र "धरम" तो सिर्फ बेवफाई ही सामने आने लगे 

4.
अब न तो मरने का हुनर ही है 'धरम' न ही जीने का कोई इरादा रहा
एक ही पहलू में आधी मौत आधी ज़िंदगी रही दूसरा पहलू सादा रहा 


Thursday, 3 January 2019

मोहब्बत का भरम-ए-फ़साना बाकी है

मुन्सिफ़ का फैसला हो चुका मोहर भी लग गई सिर्फ सुनाना बाकी है 
मगर क्यूँ अब भी लगता है कि  उसकी यादों का आना-जाना बाकी है 

दरख़्त के सूखे डाल पर अनजाने में बे-मौसम कोई पत्ता उग आया था 
पत्ता साख़ से टूट चुका है  मगर उसका अभी ज़मीं पर गिरना बाकी है

मेरे ये मोहब्बत के फूल यूँ ही  सूख गए कुबूल किसी के भी न हो सके  
मगर एक उम्मीद  ज़िंदा है कि इसका  अब फिर से निखरना बाकी है 

न कभी इशारा  हुआ न आहट हुई  न किसी ने मुझको पलटकर देखा 
बिना जंग के  ही हार  हुई बाद इसके  भी मुझमें कोई दीवाना बाकी है 

हो सके कि फिर  से ज़ख्मों में जान  आए दिल में दर्द बढ़े आह निकले 
लगता ऐसा है "धरम" कि अभी मोहब्बत का भरम-ए-फ़साना बाकी है