Wednesday, 8 January 2020

मुर्दा होने का ख़िताब

हिज़्र का एक दश्त  औ" बाद उसके  मुसलसल  हिज़्र का सैलाब
ऐ! ज़िंदगी  मुझे ख़ुद भी तो पता नहीं  कि तुमसे क्या माँगे जवाब

वो एक ख़ुशी का दरिया था  जो पहले उतरा  औ" फिर सूख गया
उस दरिया  को याद करके  क्यूँ ही करना ढ़लते वक़्त का हिसाब

वो एक रौशनी दिखी थी  जो बस थोड़े से वक़्त में ही कहीं खो गई
क्या था  यूँ कह लो  की हो किसी उतरते दिन का कोई आफ़ताब

ज़माने के दौर-ए-महफ़िल में हर ज़िंदगी के बस दो ही हैं पहचान 
या तो पूरा ज़िंदा रखता है या फिर दे देता है मुर्दा होने का ख़िताब

वक़्त ज़िंदगी का जब उतरता है 'धरम' तो वो किस तरह देखता है
जैसे की कई रँगों के हिजाब के ऊपर हो कोई एक काला हिजाब  

Friday, 3 January 2020

रह-रहकर भुलाना है

बिन तेरे वो  कारवाँ पहले  भी सूना था  अब भी सूना है
मगर क्या कहें कि  दिल-ए-दर्द  अब पहले से दुगुना है

जब साँसों से  साँसें मिलती थी तो  नज़्म उभर आता था
उस नज़्म को  अपने होठों से  अब क्यूँ ही गुनगुनाना है

फिर क्यूँ चेहरे पर उपजी  मायूसी क्यूँ दर्द छलक आया
ऐ दिल-ए-ज़ख्म तुझे फिर से क्यूँ वही किस्सा सुनाना है

वक़्त-ए-रुख़सत कहाँ ख़त्म  हुआ कुछ भी तो याद नहीं
ज़ख्म-ए-रुख़सत अब भी है जिसे रह-रहकर भुलाना है

ये कैसी बज़्म है  जिसमे एक मेरा अक्स है  और एक मैं
ऐसे बज़्म में  अपने ही दिल से दिल को  क्या मिलाना है

मौसम इश्क़ का बदलने से पहले ही ईंसाँ बदल जाता है
बाद इसके भी "धरम" कैसे हर  कोई तुम्हारा दीवाना है

Friday, 20 December 2019

चंद शेर

1.

कि बाद एक सांस के दूसरे सांस को सीने में उतरने में अब वक़्त लगता है
ये कैसा वक़्त आया "धरम" जिसे भी देखो वो आदमी बड़ा सख्त लगता है

2.

कि सिर्फ मेरा लहू ही शामिल न था  उस बुत को इन्सां बनाने में
ताल्लुकात हज़ारों लम्हों का पिरोया था 'धरम' उसमें जॉ लाने में

3.
वो शर्त ये थी कि बाद इन्तहाँ के भी न कभी ज़ख्म दिखाया जाए
न कभी आह निकले "धरम"  न कभी ग़म-ए-दास्ताँ सुनाया जाए

4.
जायका भोजन का हरेक निवाले में 'धरम' बदल जाता था
न जाने किस-किस का लहू शामिल था  उस एक थाली में

5.
कि ताज नापसंद था सर पर इसलिए हमेशा सर को झुकाए रखा
अपने इस हुनर से "धरम" उसने हमेशा ज़माने को भटकाए रखा

6.
इस हुनर से "धरम" वो हमेशा मेरे दिल में उतर कर आया
कि वो जब भी मेरे पास आया  पंख अपने कुतर कर आया

7.
कि जो भी सुबह तक जला 'धरम' चौखट उसकी रौशन रही शब भर
न जाने कितनी साँसे टूटी थी  एक गर्दन को खड़ा रखने में अदब भर 

Sunday, 15 December 2019

एक अलग ही अंदाज़-ए-बयाँ कर दिया

कि जहाँ से  जैसा भी मुझे  ख़्याल  आया मैंने सब कुछ  बयाँ कर दिया
दिल के एक हिस्से में आग लगाई औ" दूसरे हिस्से को धुआँ कर दिया

ज़िंदगी के  हरेक कदम  के लिए  कई टुकड़ों में  अपनी ज़मीं तलाशी
औ" बाद उसके  तलाशे  ज़मीं के सारे टुकड़ों  को  आसमाँ कर दिया

वो सबसे पुरानी  किताब  निकाली जिसमें कभी  एक ग़म महफूज़ था
मैंने फिर से पढ़ा औ"  एक-एक  हर्फ़ को ग़मों का आशियाँ कर दिया 

वो एक आवाज़  उठी थी  तो तख़्त  हरेक  सियासत का हिल उठा था
हुक़ूमत ने  उस हरेक शख़्स को तलाशा  औ"  फिर बेज़ुबाँ कर दिया

वो बस एक चिंगारी थी मगर जो आग दिलों में जली बहुत भयावह थी
आग ठंढी तब हुई जब उस घर में  अलग-अलग  कई मकाँ कर दिया

'धरम' वो बात जो मुझसे निकली थी वो मुझ तक फिर से पहुँच तो गई
ज़माने ने बात भी बदली औ" एक अलग ही  अंदाज़-ए-बयाँ कर दिया

Thursday, 21 November 2019

एक ग़ुमनाम शहज़ादा ही रहा

दाग दामन में बहुत लगे  फिर भी  किरदार सादा ही रहा
कि ऐ ज़माना तुमको यकीं मेरे ऊपर कुछ ज़्यादा ही रहा

ज़ख्मों से न तो कभी दिल जला न ही बदन में आग लगी
दरम्यां  ज़ख्मों के सुलगकर जीने का बस इरादा ही रहा

ख़ुद अपने ही दिल में एक लकीर खींची फ़ासला बनाया
मैं दिल के दूसरी ओर था एक ग़ुमनाम शहज़ादा ही रहा

पूरा का पूरा ज़िस्म सिमटकर  मेरे दिल में समा गया था
बावजूद इसके भी ज़िस्म उसका 'धरम' कुशादा ही रहा 

Tuesday, 15 October 2019

चंद शेर

1.
रहने दो "धरम" अब इस दिल-ए-ज़ख्म को और ताजा न करो
फिसल जाएगी दोनों ज़िंदगी  ग़र साथ रहने का इरादा न करो

2.
कि भूलने का हुनर या ना भूलने का तरीका "धरम" कुछ भी याद नहीं
बाद एक मौत के दूसरी मौत क्या कहें यहाँ अब मौत भी आबाद नहीं

3.
मुर्दे में पहले जाँ डालता है 'धरम' फिर ज़िस्म छीन लेता है
करके इश्क़ का आगाज़ बाक़ी हर रिश्ते को लील लेता है

4.
एक मुद्दत से 'धरम' तन्हाई को ओढ़े ग़ुमनाम है ज़िंदगी
इश्क़ में सब कुछ लुटाकर भी  कहाँ आवाम है ज़िंदगी

5.
जब बदन पर वतन की मिट्टी मला  चमन का राख लगाया
तब जाकर 'धरम' दरख़्त-ए-इश्क़-ए-वतन का शाख पाया

6.
ढ़लती उम्र की जवानी 'धरम' फिर कहाँ कोई कहानी लिखती है
एक दरिया बहाने के बाद उम्र फिर कहाँ कोई रवानी लिखती है

7.
रात को ओढ़कर "धरम" जब शाम सुबह तक जलती है
तब ख़ुद सुबह पूरे दिन को समेटकर शाम से मिलती है 

Monday, 16 September 2019

तब कहीँ जाकर सही फ़ैसला होता है

जब कभी कल और आज में एक उम्र का फ़ासला होता है
तब हर वक़्त तन्हाई में भी एक एहसास-ए-क़ाफ़िला होता है

जब चमन से ज़ख्म निकलता है तो रुह काला पड़ जाता है
"औ" आँखों में बाद एक ज़लज़ले के दूसरा ज़लज़ला होता है

तीरगी के फ़िज़ा में उम्मीद-ए-रौशनी यूँ ही नहीं मिलती
चिराग़-ए-दिल जलाए रखने का एक अलग हौसला होता है

हर ज़िस्म यूँ ही ग़म को अपने अंदर पनाह नहीं दे सकता
ग़म को सुकूँ से सुलाने का एक अलग ही मरहला होता है

एक ही ज़िस्म में दिल-औ-दिमाग दोनों को बखूबी संभालना
ज़िस्म में दिल या दिमाग किसी एक का अलग घोंसला होता है

जब भी दरम्यां दो दिलों के "धरम" कोई भी मसअला होता है
चारों आँखें बंद होती हैं तब कहीँ जाकर सही फ़ैसला होता है  

Thursday, 22 August 2019

ये कौन सा रिश्ता है निभाने के लिए

कि हर बार उसके  हर्फ़ में  मुझे अपना हर्फ़ मिलाने के लिए
ख़ुद को ही मारना पड़ता है  उसको ख़ुद में  जिलाने के लिए

ज़माने की छुरी से सामने  उसके अपने ही ज़िस्म को काटना
कि न जाने क्या-क्या करना पड़ता है एक दर्द जताने के लिए

जब ख़ुद से ही बे-हिसाब उम्मीद लगाए बैठे हैं तो क्या कहने
अपनी ही नींद उधार लेनी पड़ती है  ख़ुद को  सुलाने के लिए

बस आह! निकलती है  दूर तक फैले वीरां दश्त को देखकर
आज यहाँ कोई भी तो नहीं है  मुझे वापस घर बुलाने के लिए

हर ख़्वाब हकीकत था  हर लोग अपने थे  जब जाँ बाक़ी थी
जब जाँ निकली  पास कोई भी न था मुर्दे को सजाने के लिए

खुली आँखों से हकीकत भी नहीं दिखता  तो ख़्वाब का क्या
कभी नींद भी तो आती नहीं  कोई भी ख़्वाब दिखाने के लिए

ख़ुद पर हुए मुसलसल ज़ुर्म का नतीजा  अब और क्या होता
दर्द-ओ-आँसू  दोनों उधार लेता हूँ  ख़ुद को  रुलाने के लिए 

प्रारम्भ मध्य या अंत किसी का कुछ भी तो पता नहीं चलता
दरम्याँ हमारे  ये कौन सा रिश्ता है  "धरम"  निभाने के लिए

Tuesday, 20 August 2019

कुछ भी तो बचा न था उस सहारे में

न जाने क्या-क्या कह गया  वो एक लम्हा बस इशारे में
लोग समंदर तैर के आ  गए मैं बस बैठा रहा किनारे में

हरेक साँस पर अब क्या  कहें बस दम ही निकलता था 
देखने को और  कहाँ कुछ  रह  गया था  उस  नज़ारे में

ता-उम्र  वो जानते रहे  कि मेरे ज़िंदगी का  सहारा वो थे
बाद मेरे मरने के  कुछ भी तो बचा  न था उस  सहारे में

एक अजनबी  आवाज़ थी  जो मेरे कानों तक आ रही थी
देखा गौर से  मगर कोई चेहरा न उभरा उसके पुकारे में

जहाँ सूखा था दरिया 'धरम' वहाँ कैसे फिर उफान आया 
हम सोचते रहे कुछ भी पता न चला कुदरत के इशारे में 

चंद शेर

1.
वो दीपक बुझने के बाद "धरम" रात अमावस की यूँ ठहर गई
कि मैं वहीँ खड़ा का खड़ा रह गया औ" पूरी ज़िंदगी गुज़र गई

2.
क्या कि दर्द-ए-इश्क़ का इलाज़ हो न सका और मर्ज़ बढ़ता ही गया
बाद एक एहसान के 'धरम' दूसरा एहसान और कर्ज़ बढ़ता ही गया

3.
जो उड़ के ग़ुबार दामन तक आ गया तो न जाने "धरम" कितने ज़ख्म छुपा गया
चेहरे पर अब दर्द की ख़ुमारी दिखाई नहीं देती ज़ीस्त किसी और रंग को पा गया

4.
मंज़िल को पाने की उम्मीद पूरी तरह से टूटी न थी इसलिए रास्ता बदल लिया था
मंज़िल को पाने से पहले मिले सारे सोहरत को 'धरम' मैंने ख़ुद ही निगल लिया था

5.
उसने ग़ुबार सिर्फ मेरे ज़िस्म से हटाया आँखों में रहने दिया
फिर अपनी महफ़िल में 'धरम' उसने मुझे कुछ कहने दिया

6.
हर मुलाक़ात में उसने बस एक एहसान उतारा मुझपर
करके मेरी ऑंखें नम 'धरम' क्या-क्या न गुजारा मुझपर

7.
दवा तब दी गई थी "धरम" जब ज़ख्म ख़ुद-ब-ख़ुद भर आया था
शोहरत भी तब मिली थी जब एक दाग दामन में उभर आया था

8.
ज़िस्म को जब से "धरम" दो रूहों ने घेर रखा है
ज़माने ने तब से उस ज़िस्म से नज़र फेर रखा है

9.
कि उसका क्या अंदाज़-ए-ज़माना है एक अलग ही फ़साना है
क्या कहें "धरम" दिल से दिल मिलाना है  औ" दिल दुखाना है