Tuesday, 19 April 2022

कौन है किसमें कितना अंदर

एक वक़्त औ" कई सारे चेहरे जिसमें दिखते  अनगिनत मंज़र
उसकी खुली आँखें औ" ढेर  सारी यादों का  उफनता समंदर 

हुस्न औ" इश्क़  दोनों एक दूसरे को समेटे  बस खामोश रहता  
तकिये पर ज़ुल्फ़ पसारकर वो ऐसे लेटती कि हो कोई क़लंदर  

रु-ब-रु हों तो लगे कि दोनों एक दूसरे में हो इस तरह समाया 
प्रारम्भ मध्य अंत कुछ पता नहीं कौन है किसमें कितना अंदर 

कि लपटें आग की ज़ुल्फ़ों को चूमे  लहू आँखों का दीदार करे 
वक़्त के हर सितम को वो ऐसे तोड़े कि जैसे हो कोई सिकंदर 

चेहरे से निकली  रौशनी  बढ़ती दूरी के साथ  और रौशन हुई 
अपने वज़ूद को  "धरम" वो हमेशा करती रही  हुदूद से बदर 

Wednesday, 30 March 2022

एक नुमाइश-ए-बर्ज़ होता है

चेहरे  पर उदासी  औ"  दिल में  दर्द  होता है 
जो पास  तेरे जाता हूँ  तो सिर्फ़  मर्ज़   होता है  

पहले  राख बनाता है  औ"  फिर उड़ा देता है 
कि उसके इश्क़ में ऐसा भी एक फ़र्ज़ होता है 

इन्सां को  बुत बनाता है  ख़िताब डाल देता है 
ऐसा इश्क़  परदे में रहता है ख़ुद-ग़र्ज़ होता है

एक ही बात चलती है एक ही फ़साना होता है 
उसकी ज़ुबाँ से कहाँ  और  कुछ अर्ज़ होता है 

वक़्त गुजरता तो है  मगर हर  लम्हा एक सा है  
न कुछ पुराना होता है न कुछ तह-दर्ज़ होता है

'धरम'  झुककर चला औ" संग सीने पर खाया 
कि ऐसा हुनर तो एक नुमाइश-ए-बर्ज़ होता है 

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मर्ज़ - बीमारी 
तह-दर्ज़ - पूर्णतः नया
बर्ज़ - सुन्दरता

Saturday, 26 February 2022

चंद शेर

1.
ख़याल को जब भी शक्ल मिला एक झुलसा हुआ चेहरा मिला 
बदन को कोई ख़ुशबू न मिली 'धरम' रंग लहू को उतरा मिला

2.
वो पहले वा'दा-ख़िलाफ़ी करता है औ" फिर झुक जाता है 
'धरम' तन्हाई से शुरू होता है औ" इश्क़ पर रुक जाता है 

3.
सीने में उतरता तो है मगर सूराख़ नहीं करता 
कैसा इश्क़ है 'धरम' कभी बेबाक नहीं करता

4.
क्या कहें कि  एक चेहरा औ" एक ही फ़साना है 
मोहब्बत में "धरम" अब एक ऐसा भी ज़माना है 

5.
इश्क़ में "धरम" बदलता रहा  मिज़ाज उम्र भर
अश्क़-औ-लहू में होता रहा इम्तिज़ाज उम्र भर

(# इम्तिज़ाज = मिलावट) 

6.
ज़काब मेरा ख़ून-ए-दिल था "धरम" कलम उसका खंज़र था 
वो एक फ़ैसला-ए-क़िताब लिखा जिसका हर वरक़ बंजर था 

7.
ख़्वाब में मिलते भी हैं  तो लब पर ख़ामोशी रखते हैं  
औ" चेहरे पर "धरम" ख़याल-ए-फ़रामोशी रखते हैं 

8.
सितम की पैदाइश थी वो सितम का ही ज़माना था 
हर ज़ुबाँ पर 'धरम' बस फ़ाहिश का ही फ़साना था
 
(# फ़ाहिश : हद से गुज़रने वाला
# फ़साना : कहानी)

9.
हर रास्ता 'धरम' एक दलदल पर ख़त्म होता है 
औ" मंज़िल पर न जाने  क्या-क्या कत्म होता है

(#कत्म : छिपाव, पोशीदगी)


Friday, 18 February 2022

कोई भी तबीब न हुआ

अक़ीदत का एक भी फूल मेरे दामन को नसीब न हुआ  
कारवाँ में शामिल तो था  मगर कोई भी   क़रीब न हुआ  

न तो देखा हुआ तबस्सुम  न ही  तसव्वुर में उभरा चेहरा
एक अजनबी मुझसे मिला  औ" कुछ भी अजीब न हुआ  

वो शख़्स दरिया-ए-उल्फ़त की शक्ल का था औ" ख़ुश था 
उम्मीद के तराजू पर तौला गया औ" वो भी हबीब न हुआ

जहाँ भी नज़र डाली  बाद उस दोनों के  वहां कोई न रहा 
वह ऐसा शख़्स था जिसका कभी भी कोई रक़ीब न हुआ 

क्यूँ हर रोज तन्हाई की  उम्र मुसलसल  दराज़ होती गई 
'धरम' क्यूँ ज़माने में इस मर्ज़ का कोई भी तबीब न हुआ    

Thursday, 13 January 2022

एक चेहरा-ए-बशर चाहिए

हर कदम पर नई कश्ती  हर सफ़र में  नया समंदर  चाहिए 
ऐ! दिल-ए-परेशां  तुझे हर ज़ख्म पर  ख़ून-ए-जिगर  चाहिए 

हवा  शाख़ से पत्ते को उड़ा ले गई   शजर  बस  देखता रहा  
ऐ! बवंडर  तुम्हें अपने  जुनूँ का और  कितना  असर चाहिए   

तलाश-ए-यार कैसे ख़त्म होगी  तुझे ख़ुद  इसका  पता नहीं 
ऐ! अँधेरे के  अक्स तू  ये बता की   तुझे कैसी  नज़र चाहिए 

जो मेरे दामन की बुलंदी थी  वो किस-किस  को  नसीब हुई 
मुझे तो नहीं  मगर हाँ!  ज़माने को इसकी पूरी ख़बर चाहिए 

वो एक  शक्ल पर  मुखौटों चेहरों का चढ़ना-उतरना "धरम"
बावजूद इसके भी उस शक्ल को एक चेहरा-ए-बशर चाहिए 

Monday, 29 November 2021

फ़ना-ए-नस्ल

कि एक भी जाम कभी तश्ना-लब तक  पँहुच न सका  
क़ातिल का इरादा  कभी क़त्ल  तक   पँहुच न सका  

कि सूरत-ए-यार  बनाते बनाते  इल्म दम   तोड़ गया 
मगर वो  कभी  उसकी  शक़्ल तक  पँहुच   न सका

उम्र-ए-उम्मीद-ए-इश्क़  दोनों  के उम्र से ज़ियादा थी 
नतीजा यूँ  हुआ की  कभी वस्ल  तक पँहुच  न सका

"धरम" वो इश्क़ न था  बस एक  झूठी  मोहब्बत थी   
वो इश्क़ क्या जो  फ़ना-ए-नस्ल तक  पँहुच न सका

Monday, 31 May 2021

चंद शेर

1.

जब भी दिये की आढ़ में  अपना दिल जलाया 
बस "धरम" एक  सुहाना मुस्तक़बिल जलाया 

2.

कि हर मुलाक़ात में वो मुझे एक नया चेहरा देता है 
औ" मेरे हर पुराने चेहरे पर 'धरम' वो पहरा देता है 

3.
बुलंद हौसले "धरम" घुटनों के बल चले कदम साथ न चला 
कि न तो तजुर्बा साथ चला औ" न ही कभी राश्ता साथ चला

4.
कि ज़िंदगी हर कदम मेरे आरज़ू से कमती रही   
मेरे हर सजदे पर "धरम" मेरी बंदगी घटती रही 

Tuesday, 11 May 2021

चंद लम्हें आवारा लाता था

रास्ते की  हर  रौशनी  जीवन  में  एक नया  अँधेरा  लाता था 
वो उगता  हुआ सूरज  कहाँ कभी  मेरे लिए  सवेरा लाता था 

साथ ज़माने  भर का था  तो जरूर  मगर  कभी पता न चला 
कि कौन  मेरे लिए  समंदर लाता था  कौन किनारा लाता था

यूँ तो नए  ज़ख्मों का दर्द बड़ा ही नायाब होता था  मगर क्यूँ 
दिल उस सख्श को ढूंढता था जो हर ज़ख्म दुबारा लाता था

वक़्त अब मरहम  अपने साथ ले जाता है  ज़ख्म छोड़ देता है 
कहाँ गया वो वक़्त जो साथ अपने चंद लम्हें आवारा लाता था 

बाद एक शाम के दूसरी शाम हो जाती थी दिन नहीं होता था  
रात ज़िंदगी तो क्या मौत के लिए भी न कोई सहारा लाता था

न जाने  क्यूँ  अपनो के बीच भी "धरम" हमेशा दम घुँटता था  
वो कौन था  जो हर रोज  मेरे लिए  साँस का पिटारा लाता था 

Wednesday, 17 March 2021

अपनी नीयत देख लेना

हाल-ए-दिल सुनाने से पहले अपनी नीयत देख लेना 
बाजार में उतरने  से पहले  अपनी कीमत देख लेना 

आईना एक चेहरे में सिर्फ एक ही चेहरा दिखाता है 
तुम ख़ुद से अपनी आँखों में  अपनी सूरत देख लेना 

आसाँ नहीं खज़ाना-ए-ग़म-ए-ज़िंदगी महफूज़ रखना 
किस सख़्श पे  लुटानी है  कौन सी  दौलत देख लेना 

क्या बरपा था उस शाम  मुझे कुछ भी तो  याद नहीं 
वक़्त का बस तकाज़ा था  तुम मेरी   तुर्बत देख लेना 

ख़ुद से भी  अहद-ए-रु-ब-रु  करने  से पहले "धरम" 
ज़िंदगी से  ख़ुद के लिए  पाई हुई मोहलत देख लेना 

Sunday, 20 December 2020

मंज़िल को ही ज़मीं निंगल गई हो

रास्ते कल के  क्या होंगे  जब मंज़िल को ही ज़मीं  निंगल गई हो 
चीख को समंदर खा गया हो रौशनी आसमाँ कहीं में खो गई हो

एक मुद्दत से चेहरे पर मायूसी का राज है जो अब भी आबाद है 
कोई भी ख़ुशी वापस कैसे आए जब सब के सब कहीं खो गई हो 

महज साँस लेने को ही एक पूरी मुकम्मल ज़िंदगी कहना पड़ता है 
जब हरेक ख्वाईश चादर ओढ़े अपने कब्र-ए-मुक़र्रर में सो गई हो  

अँधेरा ऐसा है की सूरज के निकलने से कोई फ़र्क पड़ता ही नहीं 
गोया शाम रात के आगोश में ऐसे सोई की जैसे कहीं खो गई हो

हर लम्हा ऐसा बीतता है मानो साँस टूटने से पहले दम टूट जाता है  
ख़ुद अपनी ही नज़रों में अपनी ही नज़र "धरम" कहीं  खो  गई  हो