Monday, 3 December 2012

एक पुराना लम्हा


चांदनी रात
मोर के पूरे फैले पंख
चितकोबरे रंग का एक मेमना
पीछे के झील से हवा का गुजरना
फिर तुम्हारे बदन को छू जाना
और तुम्हारी ठंढी आहें भरना

दूर के टीले पर तुम्हारा चढ़ना
और उछल कर चाँद को चूमना
कभी कभी सन्नाटे का कुछ कह जाना
फिर मेरा तुम्हारी नज़रों से पूछना
और फिर तुम्हारा निःशब्द उत्तर

नर्म हरी घास पर तुम्हारे कोमल हाथ
और तुम्हारे हाथ पर मेरा चूमना
तुम्हारी ठहरी सी आवाज़
और मेरे सांसों का थम जाना
बर्षों बीत गए इस लम्हे को
मगर लगता है जैसे कल की बात हो


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