Friday, 14 December 2012

चंद शेर


   रात का जुगनू कितना रौशनी लुटायेगा 
   प्यास समंदर का हो तो क्या कतरा बुझा पायेगा
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  अब तो मयखाना भी सुकूँ नहीं देता 
  जिक्र-ए-जम्हूरियत वहाँ भी होने लगा
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   मेरे घर के दीवारों से भी 
   मुफलिसी दिखाई देती है 
   प्लास्टर सारे झड़ गए हैं
   अब सिर्फ ईट दिखाई देती है
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  इश्क में खाई शिकस्त याद आ गई 
  एक बार फिर उसकी याद आ गई
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  मैं तन्हा था अकेला था ठीक था 
  भीड़ में निकला तो लोगों ने लूट लिया
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  सागर के किनारे बैठा जलजला का खुराक हो गया 
  उसको चाहने वाला आज सुपुर्द-ए-खाक हो गया 
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  एक अजब दास्ताँ कुछ यूँ हुआ 
  अपने मकाँ को वह समाँ कह गया 
  औरों के दुकाँ को मकाँ कह गया
  नज़र मिली तो उसने नज़र झुका ली 
  और झुकी नज़र से ग़म-ए-दास्ताँ कह गया
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  मेरा भरम अभी रहने देना 
  तुम जब भी मुझको देखो 
  थोड़ा मुस्कुरा देना 
  मेरा भरम अभी रहने देना

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